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नरभक्षी ताऊ और लुटेरी भूआ





भारत में एक छोटे से गांव हमीरपुर में तीन भाई और एक बहन रहते थे । सबसे बड़े भाई का नाम गुलशन था । दूसरे नंबर के भाई का नाम गुलाब था । और तीसरे नंबर के भाई का नाम गुलजारी था । चौथे नंबर की बहन थी , जिसका नाम गुलफाम कली था । गुलशन के दो लडके और एक लड़की थी गुलाब के तीन लड़के और एक सबसे छोटी लड़की थी । तीसरा भाई गुलजारी था । उसके कोई संतान नहीं थी , क्योंकि उसकी शादी नहीं हुई थी । यह उपन्यास गुलाब के दूसरे नंबर के लड़के गब्बर ने प्रेषक बनकर अपना वृत्तांत सुनाया है । जब गब्बर का जन्म हुआ था तब उसके पिता गुलाब अपने बड़े घर को छोड़कर एक अलग से आकर झोपड़ी बनाकर रहने लगे थे । उनके साथ उनकी पत्नी कमला और उनके तीन बच्चे और एक सबसे छोटी बच्ची थी । उनके साथ ही गुलाब के पिताजी गब्बर के दादा भी रहते थे । वह एक सरकारी संस्था में थे । जो रिटायर हो चुके थे । उन्हें ₹5000 पेंशन के मिलते थे । बहन गुलफाम कली नहीं चाहती थी , कि गुलाब का परिवार अच्छा खाए पिए और खुशी से रहे ।
        गुलशन गुलाब और गुलजार की माताजी कामिनी थी । कामिनी के कोई भाई नहीं था । इसीलिए माता जी के माइके की सारी जमीन उनके पिताजी को मिली । जिस जमीन को गुलशन गुलाब और गुलजार की नानी के मरने के बाद जल्द ही उसे बेच दिया गया । और उसी जमीन के जो रुपए आए थे उन्हें तीन भाइयों गुलशन गुलाब और गुलजार मैं बराबर बराबर बांटने के लिए उनके पिताजी ने कहा । लेकिन तीनों भाइयों की लुटेरी बहन गुलफाम कली जिसकी शादी हो जाने के बाद भी उन पैसों से अपना हिस्सा लेना चाहती थी । इस बात को लेकर गुलाब और गुलजार को कोई आपत्ति नहीं थी ।  लेकिन सबसे बड़े भाई गुलशन को आपत्ति थी । गुलशन ने कहा कि सुन बहन गुलफाम कली हमने तेरी शादी कर दी है । अब तेरा यहां कुछ नहीं है । इसलिए नानी के जमीन के रुपया में तेरा कोई हक नहीं है । गुलफाम कली अपने बड़े भाई गुलशन से डरती थी । क्योंकि गुलशन की घरवाली बिल्कुल ही गवार औरत थी । उसे तो बोलने का भी तमीज नहीं था । हर किसी से गालियां देकर बात करती थी । इसलिए उससे सभी डरते थे । गुलशन की घरवाली के मना करने पर गुलफाम कली कुछ नहीं बोली । और चुपचाप बिना कुछ कहे अपने घर ससुराल चली गई । नानी के रूपयों को तीनों भाइयों गुलशन गुलाब और गुलजार ने बराबर बराबर बांट लिया था ।  इन रुपयों मैं गुलफाम कली को कुछ भी हाथ नहीं लग पाया । तो उसे बहुत बुरा लगा । वह इन रुपयों को अपने दो छोटे भाइयों गुलाब और गुलजार को बेवकूफ बनाकर लूटने की योजना बनाने लगी । जो अपनी इस योजना में आखिरकार सफल हो ही गई थी । वह 1 दिन अपने पिता और दोनो छोटे भाईयो गुलाब और गुलज़ार के घर आई । और घडियाली आंसू बहाते हुए बोली कि मुझको ससुराल वाले बहुत परेशान करते हैं । मुझसे यह कहते हैं के तू ससुराल से कुछ लेकर नहीं आई है । और मेरी जिठानी मुझे रोज रोज यह ताने देती है । जिससे मैं तंग आ गई हूं । और पिताजी आपसे मैं सोने के कानो के लिए झुमकी लेना चाहती हूं । क्योकि आपने मुझे शादी में नहीं दिए थे । तो पिताजी ने कहा गुलाब और गुलजार से पूछ ले । गब्बर के पिता गुलाब और चाचा गुलजार थे । गब्बर के पिता सीधे-साधे आदमी थे । और चाचा थोडे से चतुर थे । गब्बर की मां एक होशियार महिला थी । लेकिन उसकी गब्बर के चाचा पर से नहीं चलती थी । जब गब्बर की माता को इस बात का पता चला तो उसने गब्बर के पिता गुलाब को खूब समझाने की कोशिश की । लेकिन उस बिचारी औरत की बिल्कुल न चली । आखिरकार गब्बर के दादा ने कह दिया । कि कोई बात नहीं हमारी छोटी लडकी है और तुम्हारी छोटी बहन है ।  हम इसके लिए जो कुछ करेंगे वह सब पुन्य का काम होगा । इस प्रकार सभी गुलफाम कली की झूठी बातों में आ गए । और उन्हें कई बार सोने की चीज कभी अंगूठी कभी तोरिया कभी बाला बनवाते गए । लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था के गुलफाम कली एक लुटेरी बहन है । इसके बाद यह सिलसिला चलता रहा । फिर गुलशन के बड़े लड़के विक्रम का विवाह तय हुआ । गुलशन और गुलफाम काली दोनों एक जैसी प्रकृति के थे । वे दोनों ही गुलाब के परिवार की खुशी नहीं चाहते थे । जब गुलशन के बेटे विक्रम के विवाह के लिए सगाई हुई तो गुलफाम कली को बहुत अच्छा लगा । वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी । लेकिन संयोगवश कुछ उल्टा हुआ । गुलाब के पिता गब्बर के दादा अचानक से हार्ट अटैक की बीमारी से इस दुनिया से चले गए । एकदम से पूरा परिवार मातम के गम में डूब गया । गब्बर के दादा अपने बड़े भाई गुलशन को चाहते नहीं थे । क्योंकि गुलशन की पत्नी हेमलता बहुत बेकार थी । वह गुलशन से अपने ससुर में रोज गालियां देती और दिलवाती थी । एक बार तो उसने अपने ससुर में अपने भाई शिवकुमार से कह कर जूते दिलवा दिए थे । ऐसे ही रोज-रोज के झंझट से परेशान होकर गब्बर के दादा अपने दो छोटे बच्चों के साथ उस घर को छोड़कर झोपड़ी नुमा एक छोटे से घर में रह रहे थे । अब गब्बर के दादा का दाह संस्कार करना था । इसके लिए गांव के लोगों ने गब्बर के चाचा गुलजारी को कहा ।  गुलजारी चाचा अपने पिता का दाह संस्कार करने के लिए चल दिया । उनका दाह संस्कार हो गया । अब दूसरे दिन गंगा जी के लिए भी गुलजारी चाचा चला गया । इसी बीच गुलशन ने कहा के मैं भी पिताजी के अंतिम संस्कार के कुछ रुपए देने आया हूं कि वे मेरे भी पिता थे । गब्बर के पिता गुलाब ने गुलशन की मीठी बातों पर विश्वास करके अंतिम संस्कार में और ब्राह्मण भोज में सम्मिलित कर लिया । ब्राह्मण भोज हो जाने के कुछ दिनों बाद गुलशन के बेटे विक्रम का विवाह तय हो गया । विवाह की तारीख धीरे धीरे नजदीक आयी । लेकिन अब बहन गुलफाम कली परेशान थी कि वह अब किस से पैसे लूटे क्योकि गब्बर के दादा के मरने के बाद गब्बर के पिता गुलाब और गब्बर के चाचा गुलजार एक साथ तो रहते थे । लेकिन अब उनके पास रोजी रोटी के अलावा ज्यादा रुपया किसी को देने के लिए नहीं था । क्योंकि पहले तो उनके पिताजी को ₹5000 पेंशन मिलती थी । जो मरने के बाद बंद हो चुकी थी । ऐसी परिस्थिति में लुटेरी बहन गुलफाम कली ने अपने भाइयों पर बिल्कुल भी रहम नहीं किया । और अपने भतीजे विक्रम के विवाह में शामिल होने के लिए अपने छोटे भाई गब्बर के चाचा गुलजार को बेवकूफ बनाने का प्लान बनाया । एक दिन गुलजार चाचा किसी काम से अपनी बहिन गुलफाम कली के यहां गए थे । तो गुलफाम कली चाचा गुलजार से कहती है । गुलजार भाई मैंने आपके लिए मुम्बई में एक लड़की देखी है । मैं उससे बात विक्रम के विवाह के बाद करूंगी । गुलजार चाचा खुश हो जाता है और अपनी बहन बनी डायन के झांसे में आ जाता है । बातों ही बातों में भूआ गुलफाम ने चाचा गुलजार से कह दिया कि मुझको 3000 रुपयों की जरूरत है । तो गुलजार ने कह दिया 2 दिन में आ जाएंगे । इस तरह गुलफाम कली में गुलजार से ₹3000 लेने का वचन ले लिया । लेकिन जैसे गुलजार घर पहुंचा तो उसे पता चला कि घर में तो ₹5000 है । उनमें से आधे गब्बर के पिता गुलाब के हैं । क्योंकि दोनों की खेती एक साथ होती थी । और खेती का अनाज भी दोनों भाई एक साथ बेचते थे । जो पैसे आते थे उनको गुलाब अपनी पत्नी के पास रख देते थे । दोनों भाइयों गुलाब और गुलजार में बहुत प्रेम था । दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे । और गुलजार भी गुलाब से फालतू में पैसे लेकर उन्हें खर्च नहीं करता था । अब गुलजार ने बहुत कोशिश की कि वह गुलाब से पैसे नहीं मांगे । लेकिन वह बेचारा अपनी बहन गुलफाम कली द्वारा कही हुई शादी कराने वाली बात के सपने में डूबा हुआ था । अचानक से दूसरे दिन गुलजार ने झाड़ू लगाते हुए अपने बड़े भाई गुलाब से यह कह दिया । कि तू हमेशा मेरा बुरा चाहता है । तूने अपनी साली मोहिनी का विवाह मेरे होते हुए किसी और से करवा दिया । मेरी वह बहन गुलफाम कली कितनी अच्छी है अब मेरा विवाह कराएगी । फिर देखना मैं भी तेरी तरह हो जाऊंगा । गुलाब ने कहा देख गुलजार मैंने बहुत कोशिश की थी कि तुम्हारी शादी मोहिनी से हो जाए । लेकिन सभी को पता था कि तुम्हें ब्लड कैंसर है । और तुम कभी भी मर सकते हो इसलिए मोहिनी ने तुम्हारे साथ विवाह करने से मना कर दिया था । मैं करता भी क्या ? इसी बात को लेकर दोनों में बहस हो गई ।  गुलजार कहने लगा कि पिछले महीने तेरा बच्चा बीमार हो गया था उसको मैं मुम्बई लेकर गया था । वहां पर मेने उसका इलाज कराया था जिसमें मेरे ₹500 खर्च हो गए थे । उसे कौन देगा ? गुलाब ने कहा मैं दूंगा और कौन देगा ? गुलजार बोला ला दे मुझे अभी पिछले महीने ₹5000 का हमारा अनाज बिचा था उसमें से ₹2500 मेरे हुए और ₹500 इलाज के ला मुझे अभी दे । इस प्रकार गुलाब ने ₹3000 अपनी पत्नी से लेकर चाचा गुलजार को दे दिए । गुलजार चाचा तुरंत ही उन रुपयों को लेकर बहन गुलफाम कली को दे आता है । इसी बीच गुलफाम कली के बड़े भाई गुलशन को यह सब बात की भनक लग जाती है कि हमारी बहन गुलफाम कली ने हमारे पिताजी और छोटे भाइयों गुलाब और गुलजार को बेवकूफ बनाकर बहुत से रुपए लूट लिए हैं । और उन्है बेवकूप बनाकर उनसे बहुत सा सोना खरीद लिया है । उस सोने का रुपया हमारे पिताजी यानी के गब्बर के दादा ने दिया है । वह घर भी तो मेरा है जिसमें मेरे पिताजी और दो छोटे भाई रहते हैं । तो वह उस सोने को बहन गुलफाम कली से लेने की योजना बनाने लगता है । लेकिन गुलफाम कली बहुत चतुर औरत थी । उसे बेवकूप बनाना इतना आसान नहीं था । गुलफाम कली ने अपने बड़े भाई गुलशन से सोना देने से स्पष्ट मना कर दिया था । लेकिन गुलशन भी कम दिमाग का नहीं था । तुरन्त ही वर चतुराई से दूसरी तुरब फेंकता हूं । अबकी बार गुलशन ने गुलफाम कली के आदमी अपने छोटे जीजाजी जुम्मन को अपनी बातों में फसाया । उसने जुम्मन से दोस्ती की और कहा जुम्मन जी आप तो जानते हैं की हमारे बेटे विक्रम की शादी तय हो चुकी है । हमारे पास सोने के जेवर खरीदने के लिए एक भी पैसा नहीं है । आप ऐसा कर दो कि मुझे अपने किसी दोस्त की दुकान से अपनी जमानत पर 80 हजार रुपए के जेवर बनवा दीजिए । में विक्रम की शादी के बाद सारे रुपये दे दूंगा ‌। जुम्मन ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया । तो गुलशन ने अपने बड़े उसी बेटे विक्रम को कहां कि विक्रम तेरी शादी है । तू जाकर अपनी बुआ जी गुलफाम कली से ₹80000 के जेवर बनवाने का निवेदन कर । शायद वह तैयार हो जाएं । विक्रम ने ऐसा ही किया । वह अपनी बुआ गुलफाम कली के पास जाता है । और उन्हें किसी भी प्रकार जेवर बनवाने के लिए मना लेता है । बुआ गुलफाम कली और फूफा जुम्मन विक्रम की मीठी मीठी बातों में आ जाते हैं । और 80 हजार का जेवर बनवाने को पास के ही एक सुनार की ज्वेलरी की दुकान पर विक्रम को ले जाते हैं । विक्रम बहुत अच्छे अच्छे गहने अपनी घरवाली के लिए उस दुकान से खरीद लेता है । गुलफाम कली और जुम्मन यह कहते हैं कि इन ज्वेलरी के रुपयों को हमारा विक्रम शादी के बाद में तुम्हें वापस कर देगा । इस प्रकार विक्रम वहां से अपनी शादी के गहने लेकर घर आ जाता है । यह सब देखकर गुलसन मन ही मन खुश हो जाता है । और ये सोचता है कि हमारा बेटा विक्रम तो बहुत ही होशियार निकला है । लुटेरी को लूट लाया है । विक्रम गुलशन से कहता है कि पापा गहनो के रूपये शादी के बाद धीरे धीरे चुका देना । फूपाजी जुम्मन और भूआ गुलफाम कली ने मुझसे कहा है । गुलशन ने कहा ठीक है चुका देंगे । इस तरह गुलशन ने अपनी लुटेरी बहन गुलफाम कली को एक बार लूट लिया । लेकिन इस बात का बहन गुलफाम कली को बिल्कुल भी पता नहीं चल पाता है ।      उधर जब से गुलजार ने गुलाब से अपने हिस्से के रुपए लिए तब से दोनो में थोड़ी-थोड़ी अनबन हो गई थी । लेकिन शीघ्र ही यह तब बड़ी जब एक दिन गुलजार ने गुलाब के दोस्त फारुख से विक्रम की शादी के लिए ₹1000 उधार लेकर आया था गुलाब ने गुलजार से कहा कि फारुख से ₹1000 क्यों लाया है ₹3000 कहां गए तेरे ? तो गुलजार ने कहा तू शांत रह तुझे क्या करना कहां गए वे मेरे ही तो थे ? गुलाब कुछ नहीं बोला लेकिन दोनों में अंदरूनी टीश बढ़ने लगी । अब विक्रम के विवाह की वह तारीख भी आ गई दो-तीन दिन पहले बहिन गुलफाम कली अपने बच्चों के साथ अपने दो छोटे भाई गुलाब और गुलजार के यहां आकर रहने लगी उनका पूरा खर्चा गुलाब और गुलजार बहुत खुश होकर उठाने लगे । विक्रम की शादी हो गई गुलफाम कली भी अपने घर चली गई एक दिन फिर गुलफाम कली अकेली आई और अपनी बड़े भाई गुलशन के घर जाकर बोली गुलशन भैया विक्रम की शादी हो चुकी है । उसके घरवाली भी बहुत अच्छी और भाग्यवान आई है । लेकिन अब तुमको ज्वेलर के 80 हजार रुपए वापस करने होंगे । गुलशन में स्पष्ट मना कर दिया मेरे पास अभी नहीं है । इस बात का गुलफाम कली के आदमी जुम्मन को पता चला तो तो उसने कहा मैंने पहले ही कहा था । गुलशन बहुत शातिर आदमी है । उसने सारे रुपए बराबर कर लिए अब तुम भुगतो मैं ड्यूटी जा रहा हूं ।      अब कुछ दिन तक गुलफाम कली ने लूटना बंद कर दिया था । क्योंकि गुलाब और गुलजार के घर धीरे धीरे गरीबी बढ़ रही थी । गुलाब और गुलजार दोनों एक दूसरे से जब से अलग हो गए थे । गुलजार की शादी नहीं हुई थी । वो बेचारा अलग खाना बनाता था । लेकिन वह अपने लुटेरी बहन गुलफाम कली को फिर भी अच्छा मानता था । क्योंकि उन्हें हकीकत मालूम नहीं थी । गुलजार और गुलाब ने अपने-अपने खेत अलग अलग कर लिए थे । गुलाब के खेत में जो फसल होती थी उससे अपने परिवार का खर्चा नहीं चला पा रहा था ।  गुलजार अपने खेत में उत्पन्न हुए अनाज को बेचकर सारे रुपयों को अपनी शादी के लिए वहन गुलफाम कली को देता जा रहा था । और अपने खाने लायक थोड़ा सा ही अनाज बचाता था । कभी-कभी सब्जी बना लेता था । तो कभी मिर्ची की चटनी और अचार से ही खाना खा लिया करता था । उसे अपने बड़े भाई गुलाब के परिवार पर तनिक भी दया नहीं आ रही थी । उसके सिर पर तो सिर्फ शादी का भूत सवार था । जिसे गुलफाम कली ने उसके सिर पर बेवकूफ बनाकर बिठा दिया था । इस तरह गुलजार लुटता जा रहा था । लेकिन उसे हकीकत पता नहीं थी । कुछ दिन बाद गुलजार ने एक आटे की चक्की लगाई । और उसमें उसे जो रुपए आते उनको गुलफाम कली के यहां जमा करता जाता था । लेकिन अपने नतीजों की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहा था । गुलाब सोचता कि गुलजार मेरा अच्छा भाई है । लेकिन वहां कह नहीं पा रहा था । गुलजार को देखकर गुलाब ने भी अपने बच्चों को पालने के लिए कोई धंधा करना उचित समझा । लेकिन उसके पास धंधे के लिए रुपए नहीं थे । तो ऐसी स्थिति में गुलाब की पत्नी ने गुलाब से कहा मेरा भाई एक अच्छे साहूकार के यहां नौकरी करता है । मैं उस साहूकार से ₹5000 उधार लेकर आती हूं । तुम कुछ धंधा शुरू कर देना । इसी बीच गुलाब की मुलाकात गांव के एक दमदार परिवार के आदमी बीरबल से होती है । बीरबल को लेकर गुलाब अपने घर आता है । बीरबल से अपने परिवार का वृतांत सुनाता है । जिसे सुनकर बीरबल को बहुत दुख होता है । और वह कहता है कि तुम एक काम करो अपने लिए 2 भैंस बांध लो । उसके दूध से आपका खर्चा चलता रहेगा । बीरबल गुलाब को लेकर एक भैंस बेचने वाले व्यापारी के पास जाता है । और उससे ₹5000 की भैंस खरीद कर बीरबल के घर ले आता है । गुलाब और उसके बच्चे बहुत खुश हो जाते हैं । बीरबल कहता है तुम चिंता मत करो मेरे चाचा के पास एक भैंस है । उनकी शादी नहीं हुई है वह चार दिनों बाद तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं । लेकिन उनकी भैंस अभी दूध नहीं दे रही है । उसे 1 महीने आपको वैसे ही चराना पड़ेगा । फिर वह बच्चा देगी और तुम्हारे पास दूध ही दूध हो जाएगा । मैं उसे भैंस को तुम्हें उधार दिलवा सकता हूं । पैसे तुम बाद में दे देना । गुलाब खुश हो जाता है । और उस भैंस को भी ₹8000 देने की कहकर अपने घर ले आता है । इसी बीच गुलाब की हालत सही खान-पान ना होने से बिगड़ जाती है । और वह टीवी की बीमारी का शिकार हो जाता है । गुलाब की पत्नी बीरबल को साथ लेकर उसे मुम्बई हॉस्पिटल में दिखाती है । कुछ दिन तक तो उसकी हालत खराब होती जाती है । और उसे कई डॉक्टरों को दिखाया जाता है । लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है । फिर संयोगवस ईश्वर की कृपा से गुलाब को एक डॉक्टर के दवा सूट कर जाती है । और वह ठीक होने लगता है । और उसके परिवार भी अच्छे से दो समय की दाल रोटी भी आसानी से जुटा लेता है । बच्चे भी खुशी खुशी रहते है । एक दिन गुलाब अपनी बहन गुलफाम कली से मिलने उनके घर जाता है । और यह कहता है कि मैं बड़ी मुश्किल से बचा हूं । गुलफाम कली गुलाब से कहती है कि दिल्ली में टीवी का बहुत बड़ा अस्पताल है । उसमें जाकर दिखाना । साथ ही साथ वह कहती है कि बीरबल बहुत बुरा आदमी है । उससे तुमने दोस्ती कर ली है । वह तुम्हारे घर में तुम्हारी पत्नी के वास्ते आता है । और उसने ही तुम्हारे घर में तुम दोनों भाइयों में आपस में लड़ाई करवा रखी है । गुलजार मुझे सारी बात बताता है । ऐसे आदमी को तुम्हें अपने घर में नहीं रखना चाहिए ।  गुलजार और तुम दोनों भाई प्रेम से रहो । गुलाब गुलफाम कली की बातों में आकर वहां से घर के लिए आता है । घर आकर कुछ नहीं बताता है । दूसरे दिन बीरबल गुलजार के घर चाय पीने और हालचाल पूछने आता है । बीरबल और गुलाब की पत्नी दोनों बैठ कर चाय पी रहे थे । गुलाब भैंस के लिए चारा लेकर शाम के समय घर आए थे । उनका स्वास्थ्य सही नहीं था । इसलिए वो घर आकर खटिया पर लेट गए । तभी अचानक लाइट चली गई । बीरबल और गुलाब की पत्नी मोमबत्ती देख रहे थे । इसी बीच गुलाब आया । अपनी घरवाली को गुलफाम कली के बताए अनुसार बीरबल के बारे में गलत धारणा रखकर खरी खोटी सुनाने लगा । गुलाब की पत्नी और बीरबल गलत नहीं थे । इसलिए गुलाब की पत्नी ने बीरबल से कहा कि मेरे आदमी से कुछ मत कहो । तुम अब चले जाओ और इस घर में कभी मत आना । बीरबल चुपचाप बिना कुछ कहे वहां से चला जाता है । अगले दिन सुबह ही गुलाब की पत्नी अपने दो छोटे बच्चों को लेकर मायके चली जाती है । गुलाब अपनी पत्नी से 'कहां जा रही हो' यह भी नही पूछता है । दूसरे दिन गुलाब को कुछ काम से बाजार जाना था । गुलाब को साइकिल चलाने का बहुत शौक था । उसे टैम्पो या बस से पैसे देकर थोडी दूरी का सफर करना पसंद नहीं था । उनके पास साइकिल तो थी लेकिन दोनों भाइयों के बंटवारे में वह साइकिल गुलजार के हिस्से में आ गई थी । गुलजार उसे गुलाब को चलाने के लिए खुद नहीं कहता था । गुलाब सोचने लगा कि कैसे में गुलजार से बाजार जाने के लिए साइकिल मांगू । क्या पता मना कर दे ? इसलिए गुलाब की गुलजार से साइकिल मांगने की हिम्मत नहीं हो रही थी । तो गुलाब ने अपने लड़के गब्बर को बुलाया । और कहा के तुम जाकर गुलजार चाचा से कहो कि पापा को बाजार जाने के लिए 2 घंटे को साइकिल दे दोगे क्या ? गब्बर तुरंत गुलजार चाचा के कमरे में जाता है । और और गुलजार चाचा से बोलता है कि चाचा, पापा को 2 घंटे के लिए साइकिल चाहिए । क्या आप दे सकते हैं ? तो गुलजार चाचा ने कहा मैंने कब मना किया है । लेकिन वो मुझसे मांगे तब ना । वह साइकिल रखी है और ले जाए और अपने यहां ही साइकिल को रख ले । मुझे जरूरत पड़ेगी मैं मांग लूंगा । गुलजार चाचा ने जैसा कहा वैसा ही गब्बर ने अपने पिता गुलाब से कह दिया । गुलाब तुरंत गुलजार के कमरे में गया । और साइकिल निकालते हुए बोला क्या कर रहा है ? तो गुलजार ने कहा खाना बनाने की तैयारी कर रहा हूं । गुलाब ने कहा सब्जी क्या बनाई है ? तो गुलजार ने कहा कि आज सब्जी नहीं बनाई चटनी बनाई है । और अचार खराब हो गया था इसलिए फेंक दिया । तो गुलाब ने कहा आम का अचार चाहिए तो मैं लाऊं । गुलजार ने कहा फिर तो मजा आ जाए । गुलाब ने अपने बेटे गब्बर से कहा कि डिब्बे में से एक कटोरी में आचार लेकर चाचा को दे आओ अभी । गब्बर ने कहा पापा मम्मी अचार में हाथ डालने से मना करती है । कहती है कि अचार खराब हो जाएगा । गुलाब ने कहा तुम्हारी मम्मी मामा के यहां गई हुई है उसे पता ही नहीं चलेगा । और तुम अपने लिए भी खाने निकाल लेना । गब्बर ने एक कटोरी में अचार निकाला और अपने पिता गुलाब को दे दिया । गुलाब अचार की कटोरी को लेकर बडे प्रेम से छोटे भाई गुलजार के यहां पहुंचा और उससे कहा यह ले अचार । दो-तीन दिन के लिए कर लेना । वो घर पर नहीं है इसलिए मैं ले आया हूं । गुलजार ने कहा ठीक है तू अब अपने काम से जा । हां और साइकिल को अच्छे से देख कर चलाना । क्योंकि तूने 2 साल से यह साइकिल चलाई नहीं है । गुलाब खुश होकर बाजार चला जाता है । और 3 घंटे मे खुशी खुशी बाजार से घर आ जाता है । घर आते ही वह तुरन्त साइकिल को गुलजार के यहां रखने के लिए कमरे में साइकिल लेकर पहुंच जाता है । उस समय गुलजार बत्ती वाले स्टोप पर चाय बना रहा होता है ‌। गुलाब कहता है यह रखी है साईकिल । मैं अब चलता हूं । तो गुलजार कहता है ऐसे क्यों कह रहा है । क्या साइकिल तेरी नहीं है ? अपने यहां रख लेता उस घर में जैसी इस घर में । गुलजार के मुख से ऐसे शब्दों को सुनकर गुलाब बहुत खुश हो जाता है । और दोनों में एक बार फिर दोस्ती का सिलसिला शुरू हो जाता है । गुलजार कहता है कि तेरा अचार बहुत अच्छा था । दो-तीन दिन को हो जाएगा मेरे लिए । मुझे तो तुझ पर विश्वास है । अब तू बता तेरे लिए गिलास में चाय छानूं या नहीं । क्योंकि तुझे तो मुझ पर विश्वास नहीं होगा । क्या पता मैं तुझे कुछ मिला कर दे दूं । तो गुलाब ने कहा ला अब तू मुझे चाय दे फालतू बात मत करें । इस तरह गुलाब और गुलजार दोनों भाई कमरे में बड़े प्रेम से बैठकर साथ में चाय पीते हैं । तभी गुलाब का लड़का गब्बर वहां आ जाता है । गब्बर को देखकर गुलजार अपने गिलास में से एक प्लेट में थोड़ी सी चाय लेते हैं । और गब्बर को दे देते हैं । गब्बर अपने पिता गुलाब की तरफ देखता है । तो गुलाब कहता है पीले कोई बात नहीं । गब्बर भी अपने चाचा के यहां चाय पी लेता है । अब कुछ देर बाद दोनों भाई गुलाब और गुलजार बाहर बैठकर आपस में बातें करते हैं । जिसे देख कर पड़ोस वाले लोग जलते हैं ।  लेकिन उन दोनो भाईयों को कोई फर्क नहीं पड़ता । कुछ दिन बाद गुलाब की पत्नी अपने घर वापस आ जाती है । और उसे भी पता चलता है कि दोनों भाइयों में अच्छी दोस्ती हो गई है । दोनों आपस में मिलकर चार-पांच दिन से खाना बना रहे थे । गुलाब की पत्नी को खुशी होती है लेकिन वो कुछ कह नहीं पाती है । गुलाब की पत्नी के घर आते ही गुलजार बिना कुछ कहे चुपचाप साइकिल से बाजार चला जाता है । और वहां से बहुत सा खाने पीने का सामान सब्जी और मसाले लेकर आता है । और गुलाब से कहता है इनको उधर अपने कमरे भाभी को दे आओ । गुलाब खुशी खुशी अपनी पत्नी और बच्चो के यहां उस समान के थैले को लेकर अपनी पत्नी के हाथ में देता है । एकदम से पत्नी चिल्लाकर कहती है । मुझे उस दुष्ट गुलजार का कोई भी सामान नहीं चाहिए । उसे वापस करके आओ । गुलाब बिना कुछ कहे सामान को अपने घर में ही रख कर बाहर चला जाता है । गुलाब के चले जाने के बाद उसके छोटे छोटे बच्चे अपनी मां से कहते है देखो मम्मी चाचा ने केले भेजे हैं । गुलाब की पत्नी ने अपने बच्चो से कहा चुपचाप रहना कोई सामान को हाथ नहीं लगाएगा । बरना हड्डी तोड़ कर फेंक दूंगी । मां के डर से कोई कुछ नहीं बोला । सभी चुपचाप अपने कमरे में बैठे रहे । शाम के समय जब गुलाब घर आया तो उसने देखा कि थैला जैसा था वैसा ही रखा है । किसी ने भी थैले से हाथ नहीं लगाया था । गुलाब ने अपने पुत्रो को आवाज देकर कहा गब्बर, राजेस, राजीव लो केले खा लो सभी ने अपनी मां की तरफ देखा तो मां की आंखें गुस्से से लाल थी । किसी ने अपने पिता गुलाब से केले लेने की हिम्मत नहीं की थी । पूरे सामान और केलो को लेकर गुलाब गुलशन के यहां चला गया और और थैला रख दिया । और गुलजार चाचा को सारी बात बता दी । गुलजार ने कहा तू एक काम कर कल अपनी बहन गुलफाम कली के यहां जाकर पूछ कि अब मुझे क्या करना चाहिए । वह बहुत अच्छी है और अपना हमेशा भला चाहती है । गुलाब दूसरे ही दिन बहन गुलफाम कली के यहां जाता है । और उसे आपने परिवार का किस्सा सुनाता है । जिसे सुनकर लुटेरी गुलफाम कली मन ही मन बहुत खुश होती है । यह कहती है गुलाब भाईसाहब जितना हो सके उसे परेशान कर । बच्चों को परेशान कर । तभी उसके होस ठिकाने आऐंगे । गुलाब ने अपनी बहिन गुलफाम कली के कहे अनुसार वैसा ही किया । वह अपनी पत्नी से रोज-रोज झगड़ा करने लगा । झगड़े से तंग आकर एक दिन गुलाब की पत्नी ने सुबह 8 बजे के समय अपने चारों बच्चों को कुऐ के पास ले जाकर कहां । सभी एक एक से इस कुएं में कूद जाते हैं । गुलाब की पत्नी ने सबसे बड़े बेटे राजेश से सबसे पहले कुए में कूदने के लिए कहा । लेकिन राजेश ने मना कर दिया । अब गब्बर का नंबर था । गब्बर से मां ने कूऐं में कूदने के लिए कहा गब्बर पहले तुम कूद आओ । तो गब्बर ने कहा मां मेरा नंबर तो राजेश के बाद में आएगा । क्योंकि वह मुझसे बड़ा है । राजेश ने कहा में नही पहले ये कूदेगा । तभी अचानक से गुलजार चाचा मटका लेकर कुऐं पर पानी भरने आते है । गुलाब की पत्नी सभी बच्चों को वहां से लेकर अंदर चली जाती है । और वह समझ आती है कि बच्चों को मौत से डर लग रहा है । इन्हें धोखे से मौत के हवाले करना पड़ेगा । नहीं तो मेरे मरने के बाद इनको इनके पापा गुलाब , चाचा गुलजार और भूआ गुलफाम कली परेशान करेंगे । और बेचारे रोएंगे तथा मुझे याद करेंगे । इसलिए गुलाब की पत्नी ने अपने मरने से पहले अपने बच्चो का मरना उचित समझा था । लेकिन मरना इतना सरल नहीं था । अगले दिन गुलाब की पत्नी अपने बच्चों को लेकर अपने मायके में चली जाती है । मायके में गब्बर के छोटे भाई राजीव को मामा अपने यहां रखने के लिए अपनी बडी बहन से कहते हैं ।  दीदी राजीव को हमारे यहां छोड़ दो । हम इसको अच्छे स्कूल में भर्ती करा देंगे । और अच्छे से रखेंगे । राजीव की मां ने कहा मुझे कोई आपत्ति नहीं है । खुशी से राख लो । तीन-चार दिन बाद गुलाब की पत्नी राजेश को अपने माइके में छोडकर अपने ससुराल आने की तैयारी करती है । मामा के पड़ोस में ही सोने चांदी को गलाने वाले बंगलोर के सुनार रहते थे । इनकी मामा से अच्छी दोस्ती थी । एक दिन गुलाब की पत्नी ने देखा कि पड़ोस में रहने वाला सुनार बाहर से तेजाब के बड़े-बड़े ड्रम मगाते है । और उनमें पूरे बाजार के सुनार तेजाब लेने आते थे । गुलाब की पत्नी ने तेजाब के बारे में सुना तो था । पर देखा नहीं था । तो एक दिन उसने सुनार से कहा भैया तेजाब कैसा होता है मुझे बताओ मेने देखा नही है । तो सुनार ने कहा तुम घर पर जाकर अपनी भाभी से देख लो । यहां में अभी काम कर रहा हूं । घर पर बहुत रखा है । गुलाब की पत्नी सुनार की घरवाली के पास उसके घर जाती है । और उससे तेजाब के बारे में पूछती हहै । सुनार की घरवाली बताती है यह देखो तेजाब यह बहुत खतरनाक होता है । यह हमारे शरीर को जलाकर सफेद कर देता है । इससे दूर रहना चाहिए । गब्बर की मां ने कहा भाभी यह बताओ इससे फायदा क्या है । वह बोली हमारे पतिदेव इसे सोना चांदी गलाने में प्रयोग करते हैं । यह कितना भी गंदा बर्तन हो उसे चुटकियों में चमका देता है । गुलाब की पत्नी ने कहा कैसे ? तो सुनार की घरवाली ने एक गंदा डिब्बा लिया जिसके तले में गंदगी जमी थी । उसमें तेजाब को डाला । कुछ ही देर में तेजाब की गर्मी से उसमें सावन जैसे झाग उत्पन्न होने लगे । जब झाग शांत हो गए फिर उसने तेजाब को एक गड्ढे में डाल दिया । और उस डिब्बे को दिखाया वह एकदम चमक रहा था । उसकी तली में काफी गंदगी लगी थी । वह पता नहीं कहां चली गई । गुलाब की पत्नी ने कहा भाभी जी हमारे घर में कई सारे बर्तन है । उनमें ऐसी गंदगी लगी है । वह छूटती ही नहीं है । तो सुनार की पत्नी ने कहा है तुम एक काम करो । जब तुम घर जाओ उस दिन मुझे बता देना । मैं तुम्हें एक बोतल तेजाब फ्री में दे दूंगी । गुलाब की पत्नी ने कहा फ्री में क्यों मैं पैसे दे दूंगी में ? तो सुनार की पत्नी ने कहा तुम्हारे भैया तुमसे पैसे लेंगे ही नहीं क्योंकि वह तुम्हें बहन मानते हैं । गुलाब की पत्नी ने कहा ठीक है मैं कल घर जाऊंगी । कल तुम मुझे एक बोतल तेजाब भर देना । अगले दिन सुनार की पत्नी ने एक बोतल तेजाब अपने पति से पूछ कर अलग रख दिया । अगले दिन गुलाब की पत्नी राजीव को मामा के यहां छोड़ कर अपने दो बच्चों और एक बच्ची को लेकर ससुराल के लिए जाने लगी । सभी लोग उनके पैर छूकर उन्हें जल्दी वापस आने के लिए कहने लगे । सुनार की पत्नी ने पैर छुए और 10 रूपये के साथ वह तेजाब की बोतल गुलाब की पत्नी को दे दी । और बोली ननद जी आपकी बहुत याद आएगी । फिर जल्दी घूम जाना । गुलाब की पत्नी ने कहा अभी मैं गई ही नही और तू कह रही है जल्दी आ जाना । मै आ जाऊंगी ठीक है । अपने बच्चो का और मेरे भैया का ख्याल रखना । सुनार की पत्नी ने कहा ठीक है ननद जी । गुलाब की पत्नी बच्चों को लेकर बस स्टैंड पर पहुंची तो वहां एक बस खड़ी थी । उसने कहा क्यों कहां जाना है । तो गुलाब की पत्नी ने कहा हमीरपुर जाना है । हमीरपुर वहां से 4 किलोमीटर दूर था । तो उसने कहा ₹5 लगेंगे हमीरपुर के जबकि उस समय ₹2 किराया था । तो गुलाब की पत्नी ने कहा ₹3 ले लेना । लेकिन बस वाला नहीं माना । तो गुलाब की पत्नी थोड़ी आगे पहुंची वहां पर उसे एक टेंपो दिखा । जो गांव की तरफ जा रहा था । गुलाब की पत्नी ने टेंपो को रुकने का इशारा किया । टेंपो वाले ने कहा कहां जाना है ? गुलाब की पत्नी ने कहा भैया हमें हमीरपुर जाना है । टेंपो वाले ने कहा 3 रुपए लगेंगे । गुलाब की पत्नी बच्चों को लेकर टेंपो में बैठ गई । कुछ ही देर में ससुराल आ गया । ससुराल पहुंचते ही अपने कमरे का ताला खोला । सभी बच्चे अपनी मां के साथ अंदर पहुंच गए । बच्चों के पिता गुलाब सामने खड़े होकर खुश होकर देख रहे थे ।  मेरे बच्चे मुझसे पापा कहेंगे । लेकिन मां के डर से किसी ने पिता की तरफ देखा तक नहीं । कुछ ही देर में पता चला कि घर पर आटा नहीं है । अब रोटी कैसे बनेगी । इसी सोच में शाम हो गई थी । उस समय रक्षाबंधन व्यतीत हुआ था । तो आते समय मामा के पड़ोस वालों ने अपने अपने घर से कुछ मिठाइयां गुलाब की पत्नी को दे बांध दिए थे । उनमें से गुलाब की पत्नी ने शाम के समय थोड़ी थोड़ी मिठाई बच्चों को खिलाई और थोड़ी सी खुद ने खाई । इस तरह एक रात बीत गई । अब अगली सुबह जब उठे तो मां ने बड़े लड़के राजेश को दूध लाने के लिए ₹3 दिए । जिनको लेकर बड़ा भाई गांव से 250 ग्राम दूध ले आया । गुलाब की पत्नी ने उस दूध में से थोड़ा सा लिया । और सभी के लिए थोड़ी-थोड़ी चाय बनाई । चाय पी कर सभी बच्चे खेलने लगे । लेकिन दोपहर में जब भूख लगी तो सभी मां के पास आकर बोले । मां ने मायके से लाई मिठाई में से सभी बच्चों को बराबर बराबर दे दी । इस तरह 3 दिन व्यतीत हो गए । तीसरे दिन दूध भी खत्म हो गया था । सुबह ही मां ने बड़े बेटे राजेश को ₹3 देकर दूध लाने को कहा । राजेश दूध ले आया । सभी के लिए चाय बनाई गई । लेकिन आज सारी मिठाई खत्म हो चुकी थी । इस समय तभी परेशान थे । धीरे धीरे दोपहर हुई । सभी बच्चो को भूख सताने लगी । सभी अपनी मां के पास आकर कहने लगे । मां ने कहां आज खाने को कुछ नहीं बचा है । यह चटाई लो और आराम से सो जाओ । भूख लगे तो कलश मैं पानी रखा है । उसको पी लेना । सभी भूख के मारे सो गए । पता ही नहीं चला कब रात हो गई थी । रात हो गई तो सभी बच्चे पानी पीकर सो गए । लेकिन किसी को नींद नहीं आ रही थी । सभी बच्चे भूख के मारे तिलमिला रहे थे । लेकिन कर भी क्या सकते थे । इस तरह बिना खाना खाए 3 दिन व्यतीत हो गये । तीसरे दिन गांव में एक बर्फ वाला आया । गुलाब की पत्नी ने ₹4 पर्स में से निकालकर बड़े लड़के राजेश को देकर सभी के लिए एक एक बर्फ का दूध वाला गोला लाने का आदेश दिया । राजेश दौड़ता हुआ बर्फ वाले के ठेले पर पहुंचा । उससे ₹4 की बड़ी-बड़ी दूध वाली बर्फ के गोले लेकर घर आ गया । सभी ने वह बर्फ बड़ी खुशी से खाई । उस बर्फ से सबकी जान में जान आई । गब्बर बताते हैं कि वह बर्फ उस दिन अमृत जैसी लग रही थी । उसके बाद सभी ने कुछ देर बातें की । और फिर सो गए । धीरे-धीरे रात हो गई । रात को सभी ने पानी पिया । और अपने अपने बिस्तर पर सो गए । अगले दिन सुबह उठे तो हलवा की खुशबू आ रही थी । दरवाजे पर जाकर देखा तो गुलजार चाचा हलवा बना रही थे । कोई भी हलवा गुलजार चाचा से नहीं मांग सका । तभी अचानक एक आम बेचने वाले की आवाज सुनाई देती है । सभी मां से कहते हैं । मां कहती है पहले यह देखो बाहर तुम्हारे पापा या फिर गुलजार चाचा तो तो नहीं है । उस समय बाहर कोई नहीं था । तो गब्बर की मां ने एक थैली में अनाज भर दिया । और कहां राजेश तू जल्दी जा और आम लेकर आ । राजेश तुरंत गया और 1 किलो दशहरी आम लेकर आया । सभी ने एक एक खाया और शेष बचे हुए मां ने रख दिए । साम के समय मां ने सभी बच्चों से कहा कि आज बहुत गर्मी है । गब्बर बताते हैं कि उस समय हमारे पास न तो सोने के लिए खटिया थी और नहीं एक भी कूलर , पंखा था । हमारा मकान भी कच्चा था । कई बार चूहे , छछूधर , बिच्छू , कनखजूरे और सांप आकर हमपर सोते समय रात में चड जाते थे । क्योकि हम जमीन पर सोते थे । मां ने छत पर चलकर सोने का आदेश दिया । गब्बर ने चटाई उठाई और सभी से कहकर ऊपर छत पर सोने के लिए चल दिया । उसके साथ ही सभी भाई बहिन और मां ऊपर के लिए चल दिए । ऊपर छत पर पहुंचकर कुछ देर बातें की । फिर छोटी बहन ने कहा भूख लग रही है । मम्मी ने कहा तुम सब यहीं बैठना । कोई भी नीचे मत आना । मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने के लिए लाती हूं । यह कह कर गुलाब की पत्नी ऊपर छत पर से सीढ़ियां से उतरकर नीचे कमरे में आती है । और वह सुबह के रखे हुए कुछ आमों को चूल्हे में भूंजने के लिए दे देती है । चूल्हे में लकड़ियों की तेज आग जल रही थी । क्योंकि थोड़ी देर पहले ही गुलाब और गुलजार ने वहां पर खाना बनाया था । पांच सात  मिनट में आम भुंज जाते हैं । गुलाब की पत्नी आमो को लेकर आमरस बनाने के लिए छीलकर एक स्टील के जग में पानी में आम के गूदे को निकाल लेती है । तब तक 20 मिनट हो जाते हैं । गब्बर ऊपर से नीचे अपनी मां को देखने आता है । कि मां खाने के लिए क्या बना रही है । लेकिन गब्बर जैसे ही कमरे में पहुंचता है । और अपनी मां को देखते ही वह दंग रह जाता है । क्योंकि उसकी मां एक जग में मामा के यहां से लाए हुए तेजाब में से 2 ढक्कन तेजाब जग मैं डाल देती है । यह सब गब्बर देख लेता है । अचानक से मां की नजर गब्बर पर पड़ती है । तो मां उस पर एकदम चिल्लाती है । नीचे क्यों आया । गब्बर चुपचाप बिना कुछ कहे दोबारा से ऊपर चला जाता है । कुछ ही देर में गुलाब की पत्नी गब्बर की मां उसी जग को जिस जग में उसने तेजाब डाला हाथ में लेकर और साथ में चार कटोरी लेकर ऊपर आ जाती है । लेकिन मां के डर से गब्बर किसी से कुछ नहीं कहता है । और चुपचाप बैठा रहता है । गब्बर की मां चारों कटोरी मैं आमरस को बच्चों को देकर एक कटोरी अपने पास रख लेती है । बड़ा भाई और छोटी बहन दोनों बड़े चाव से आमरस को पी लेते हैं । लेकिन गब्बर बडे भाई ओर छोटी बहिन की तरफ उनके चेहरों को देखता है । जब दोनो आमरस को पीकर अपनी कटोरी खाली कर देते हैं । तो उसके बाद गब्बर भी अपनी कटोरी को भगवान का नाम लेकर पी लेता है । लेकिन उसे अपने से ज्यादा अपने भाई और छोटी बहन की परवाह होती है । कुछ देर बाद सब सो जाते हैं लेकिन गब्बर को नींद नहीं आती है । क्योंकि उसे डर सताता है कि कहीं उसका भाई और छोटी बहन तेजाब से मर तो नहीं गए । जब सब सो जाते हैं तो गब्बर चुपचाप उठता है । सबसे पहले वह अपनी छोटी बहन की ओर देखता है । कि कहीं वह मर तो नहीं गई है । तो वह आराम से सो रही थी । लेकिन गब्बर को तसल्ली नही होती है । वह चुपके से अपने हाथ को अपनी बहन के दोनों नाकों के बीच रखकर देखता है । कि सांस चल रही है या नहीं । अगले ही क्षण उसे सुकून मिलता है सांस चलने का अनुभव हो रहा था । फिर वह अपनी मां की तरफ देखता है कि कहीं मां तो नहीं मर गई । वह कहता है मां मुझे बाथरूम जाना है । तो मां कहती है चले जाओ मैं जग रही हूं । गब्बर को सुकून मिलता है । चलो सब ठीक है । अब वह अपने बड़े भाई राजेश से कहता है । राजेस थोड़ा आगे चल मुझे गर्मी लग रही है और वह उसे धीरे से धक्का मारता है । जिसका राजेस को पता चल जाता है । तो वह कहता है क्या बात है मुझे क्यों धक्का मार रहा है । मैंने कहा मुझे गर्मी लग रही थी । अब सब सो जाते हैं लेकिन गब्बर को देर रात तक नींद नहीं आती है । और वह बार-बार पर सब को देखता रहता है । कि कहीं कोई मर तो नहीं गया । लेकिन प्रभु की कृपा से सब ठीक होता है । अगले दिन सुबह हो जाती है । सब नीचे आ जाते हैं । गुलाब की पत्नी जल्दी से सभी को नहाने के लिए कहती है । गब्बर बताते हैं कि उस समय हम छोटे थे इसलिए नहाने के नाम पर रोते थे । मां जबरदस्ती पकड़ कर हमें नहलाती थी । उस दिन मां ने कहा सभी जल्दी आ जाओ । और नहा लो । क्योंकि आज मामा के यहां चल रहे हैं । सभी अपने-अपने कपड़े उतार कर नहाने के लिए बाथरुम में आ जाते हैं । तीनों बच्चों को नहला देने के बाद गुलाब की पत्नी स्वयं नहाती है । और फिर बच्चों को नए कपड़े पहनाकर मामा के यहां ले जाती है । साथ में एक कनस्तर में कुछ गेहूं लेकर उनको बाजार में पिसवाने के लिए गब्बर के सिर पर रख देती है । उस कनस्टर का वजन 9 किलो था आज भी गब्बर को याद है । मामा के घर से थोड़ी दूरी पर उस गेंहूं के कनस्टर को पिसवाने के लिए गब्बर की मां एक चक्की पर डाल देती है । और हम सब फिर मामा के यहां पहुंच जाते हैं । मामा के यहां पहुंचते ही सभी लोग खुश हो जाते हैं । और छोटा भाई राजीव भी हमपर बहुत प्रसन्न होता है । क्योंकि हम 10 दिन बाद वहां पहुंचे थे । मामा और नानी भी बहुत खुश हो जाते हैं । इस बार मामा के यहां हम कम से कम 20 दिन रहते है । फिर एक दिन मामा के यहां से घर के लिए आते हैं । उस दुकान पर जाते हैं जिस दुकान पर जब हम आए थे तब हमने गेहूं पिसाने के लिए डाले थे । दुकान वाला कहता है के दीदी तुमने तो इतने दिन से इस कनस्टर को ले जाने का ध्यान ही नहीं दिया चलो कोई बात नहीं । उस कनस्टर को गब्बर अपने सिर पर रखकर अपनी मां के साथ बस अड्डे की तरफ चल देते हैं । बस वाले आटे का कनस्टर बस में रखने से मना कर देते हैं । तो फिर गब्बर की मां आगे टेंपो स्टेंड पर चल देते हैं । वहां उन्हे एक टेंपो मिल जाता है ।  जिसमें बैठकर सभी अपने घर की तरफ आ जाते हैं । घर का ताला खोलकर सभी बैठ जाते हैं । शाम के समय मां खाना बना लेती है । सभी खाना खाते हैं । और सो जाते हैं । इस तरह दिन 15 दिन बीत जाते हैं । फिर आटा खत्म हो जाता है । और पूरे परिवार पर एक बार फिर भूखे मरने की नौबत आ जाती है । इसी प्रकार दो-तीन दिन किसी भी तरह भूख में कट जाते हैं । चौथे दिन सुबह-सुबह गुलाब की पत्नी गब्बर की मां कमरे में झाड़ू लगाते लगाते दरवाजे तक पहुंचती है तभी अचानक रोज आने वाला एक भिखारी आता है और जोर से कहता है "सीताराम" । हम तो खुद 3 दिन से भूखे मर रहे थे । भिकारी को क्या देते तो हमारी मां ने भिकारी से कहा बाबा तुम रोज आते हो । एक काम करो आज हमारा आटा खत्म हो गया है हमें 1 किलो आटा दे जाओ । हम तुम्हें दो-तीन दिन बाद वापस कर देंगे । भिकारी ने कहा ठीक है कोई बात नहीं । गब्बर की मां ने भिकारी से 2 किलो आटा उधार ले लिया । और खुशी खुशी रोटी बनाई । सभी ने वह रोटी बिना सब्जी के नमक और पिसी लाल मिर्च रखकर उसमें थोडा सा पानी डालकर बड़े चाव से खाई । गब्बर बताते हैं कि हम मैसै किसी नै भी 3 दिन से कुछ नहीं खाया था । वह भोजन उस दिन हमें 56 भोग लग रहा था । तभी हमें पता चलता है कि हमारे पड़ोस में ही खान बाबा ने एक चक्की खोल ली है । तुरंत ही हमारी मां ने गेंहूं को बीनकर बड़े भाई राजेश को ₹3 देकर खान बाबा के यहां 15 किलो का गेहूं सिर पर रखकर पिसाने के लिए भेज दिया । अगले दिन गब्बर की मां ने उधार दिए हुए भिकारी के आटे को वापस कर दिया । हम सब बहुत खुश थे । और खाना-बाबा को बहुत धन्यवाद देते थे । कि उसने चक्की खोलकर बहुत अच्छा किया है । अब हमें भूखा नहीं रहना पड़ेगा । लेकिन अब रोज-रोज नमक और मिर्च से सूखी रोटी खा खा कर हम परेशान हो चुके थे । तो हमने कहा मम्मी आज तो कुछ सब्जी बना लो । तो मां ने कहा कुछ है ही नहीं । और बाजार से लाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं है । में क्या बनाऊं ? तो बड़े भाई ने कहा एक काम करते हैं । आज कोई है । तुम मुझे अनाज दे दो मैं गांव में ही ख्याली की दुकान से हरी धनिया और हरी मिर्च ले आता हूं । उनकी चटनी बांट लेंगे । तो मां ने कहा ठीक है ले जाओ । बड़ा भाई राजेश थोड़ा सा अनाज लेकर ख्याली की दुकान पर पहुंचा । और उधर से हरी मिर्च और धनिया ले आया । मां ने हरी धनिया और मिर्ची की चटनी बांट दी । सबने बड़े प्रेम से खाना खाया । और साम को सभी सो गए । इस तरह दिन बीत रहे थे । लेकिन बिना पैसे चोरी छुपके अनाज बेजना सही नहीं था । किसी ने गब्बर के पिता गुलाब से शिकायत कर दी । कि आपकी पत्नी बच्चों को भेज कर दुकान पर अनाज विचवाती है । गुलाब को गुस्सा आ गया । उसने कहा मैं तुझे एक खेत देता हूं उसके अनाज का तू कुछ भी कर । गुलाब ने एक ढाई बीघा खेत अपनी पत्नी और बच्चों को दे दिया । उसके बोने की जिम्मेदारी भी गुलाब की पत्नी को मिली । गुलाब ने स्पष्ट कह दिया मैं इस खेत में एक भी पैसा नहीं लगाऊंगा । तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो । अब खेत के बुआई का समय आया । तो खेत को बटाई से करने वाला मजदूर घर आया । और उसने खेत की बुआई के लिए कुछ रुपए मांगे । लेकिन गुलाब की पत्नी पर उस समय एक भी रुपया नहीं था । तो उसने बाद में देने का वादा कर दिया । खेत बोये जा रहे थे । उस दिन गुलाब की पत्नी ने अपने दो बेटे राजेस और गब्बर को खेत पर भेज दिया । और यह कहा कि खेत बो जाए तब आना । उसके बाद उस खेत की 5 परिक्रमा लगाना । और हाथ जोड़कर आना । मैंने और राजेश ने हां कह दिया । दोनों खेत पर चले गए । राजेश ने मां के कहे अनुसार खेत की परिक्रमा नहीं की । मैंने खेत की 5 परिक्रमा दे रहा था । तो वहां बैठे बहुत से लोग मुझ पर हस रहे थे । लेकिन मैंने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया । मैंने मां के कहे अनुसार खेत की पांच परिक्रमा की । अंत में हाथ जोड़कर प्रणाम किया । फिर हम दोनों भाई घर आ गए । फिर एक दिन हमारी मां ने यह सोचा इस तरह जीने से कोई फायदा नहीं है । तो उन्होंने एक दिन अपने पति गुलाब की परीक्षा लेनी चाही । कि इनका बाप अपने बच्चो से प्यार करता है या नहीं । इस खतरनाक परीक्षण लिए गब्बर की मां ने गब्बर को ही चुना । एक दिन गुलाब की पत्नी ने सुबह-सुबह गब्बर को नहलाना शुरू किया । मेरे पैरो में धूल में खेलने की वजह से बहुत अधिक मेल जम रहा था । उसको पत्थर की सहायता मां नहाते समय निकाल रही थी । मैं जोर जोर से रो रहा था । लेकिन मां नहीं मान रही थी । तभी अचानक मेरे पिताजी गुलाब बाहर से उठकर कूऐ पर आए । और मुझे वहां से हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गए । थोड़ी देर बाद कुए पर से मां अंदर चली गई । तो पिताजी ने मुझे नहला दिया । फिर वे मुझे अपने यहां ही ले गए । मेरे पापा गुलजार चाचा के साथ उनके कपड़े में रहते थेगुलजार चाचा बोले तू हमारे यहां ही रह जा वहां मत जा मैं उस समय छोटा था मुझे अपने भाई और बहन के बिना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था जिस समय मैं मां से अलग होकर पिता जी के यहां रहने पहुंचा उस समय फरवरी मार्च का महीना था मेरे भाई बहन और मां मुझसे बोलते नहीं थे मुझे बहुत दुख होता था एक दिन मेरा बड़ा भाई और छोटा भाई दोनो कहीं से बेर तोडकर लाए और मुझे दिखा कर खा रहे थे लेकिन मुझे मां के डर से एक बेर तक खाने को नहीं दिया मैं सामने बैठ गए देखता रहा गुलजार चाचा ने कहा कल गब्बर को भी अपने साथ बेर लेने के लिए ले जाना लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा वह रोज शाम के समय बेर लेने के लिए जाते थे एक दिन मैंने भी उनके साथ जाने का प्लान बनाया लेकिन वह मुझे अपने साथ ले जाना नहीं चाहते थे क्योकि मे उनसे अलग होकर पिताजी के साथ दूसरे कमरे में रहता था फिर भी दूसरे दिन में दोपहर 2:00 बजे से ही दरवाजे पर बैठ गया कि कब मेरे भाई बेर लेने के लिए जाएं और मैं बिना बताए उनके पीछे पीछे चला जाऊं धीरे धीरे शाम का समय हुआ तो वो लोग बेर लाने के लिए पौलीथिन ढूंढने लगे मैं बहुत खुश हो गया चलो अब यह जाने वाले हैं मैं चुपके से उनके पीछे जाने को तैयार हो गया दोनों भाई बेर लेने के लिए घर से निकल पड़े पीछे पीछे मैं भी उनके साथ चल रहा था वह करीब 1 किलोमीटर दूर एक बेर के पेड़ के पास पहुंचे और पत्थर मार-मार कर उनसे बेर झराने लगे थोड़ी देर में मैं भी वहां पहुंच गया और मैंने भी बेर इखट्टे करने शुरू कर दीए तभी उन्हें अचानक पता चला कि एक गांव की ही खतरनाक पागल उनकी तरफ आ रही है उसके आने से पहले ही दोनों भाई वहां से रफू चक्कर हो गए लेकिन मुझे उसका पता नहीं चला कि यह लोग क्यों भाग गए हैं मैं यह समझ रहा था यह वैसे ही चले गए है मैं बेर तोड़ने में मस्त रहा तभी थोड़ी देर में वह पागल मेरे पास आ जाती है और मेरी गर्दन पकड़ लेती है मैं अचानक से बुरी तरह डर जाता हूं लेकिन कर भी क्या सकता था वह पागल मुझसे सारे बेर छीन लेती है और मुझमें जोर से धक्का मार देती है मैं जैसे तैसे उससे अपनी जान बचाकर घर आता हूं तो दोनों भाई ताली दे देकर मुझ पर हस रहे थे के पागल ले इसकी गर्दन पकड़ ली थी और इसके सभी बेर छीन ले गई और रहेगा क्या पापा के साथ में । मैं शांत बैठा रहा कर भी क्या सकता था मैंने अपने भाइयों से कहा तुम्हारी तरफ आने के लिए मुझे क्या करना पड़ेगा यह बात मेरी मां ने सुन ली मम्मी ने कहा कि तुझे कल सुबह अपने बाप के आगे यह बात कहनी है मैं कि मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगा में तैयार हो गया दूसरे दिन मैंने पापा के आगे यह बात कह दी कि पापा मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगा मुझे तो मम्मी के साथ रहना है पापा ने कुछ नहीं कहा अब एक बार फिर गब्बर को अपनी मां और भाइयों के साथ रहने का मौका मिल गया । गब्बर अब अपनी मां और भाइयों के साथ बड़े प्रेम से रहने लगता है । सुबह-सुबह तीनों भाई खाना बनाने के लिए लकड़ी लेने जाते हैं । लकड़ी लेने के लिए बिना डर के बड़ी-बड़ी झाड़ियों में प्रवेश कर जाते हैं । इस तरह उनका रोज का काम बन जाता है  । इस तरह से दो महीने बीत जाते हैं । फिर हमारी मां सभी को लेकर फिर मामा के यहां चली जाती हैं । और वहां रहकर अपना बुरा समय निकालते हैं । ज्यादा दिन तक रहने से नानी को बुरा लगता है । फिर वह हमें सबसे ऊपर के कमरे को रहने के लिए दे देती है । उस कमरे में हम सब बच्चों को बहुत डर लगता था । क्योंकि उनके मकान पर सदैव बंदर आ जाया करते थे । बंदरों से गब्बर और गब्बर के सभी भाई बहन बहुत डरते थे । जो कमरा हमें नानी ने रहने के लिए दिया था । उसने दरवाजा नहीं था । वह बिल्कुल खुला था ।  इसलिए उस कमरे में दो-तीन दिन में एक दो बंदर अवश्य दस्तक दे जाते थे । लेकिन हम कर भी क्या सकते थे । हम ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर थे । बंदर हमेशा दिन के उजाले में ही आया करते थे । परन्तु  उनका निश्चित समय नहीं था । कि दिन में कब टपक पड़ें । सुबह जल्दी उठकर हम उस कमरे से नीचे चले जाते थे । नीचे कुछ सुनार लोगों के छोटे छोटे बच्चे रहते थे । उन लोगों से हमने दोस्ती कर ली । उनके साथ ही खेलते कूदते थे और साथ-साथ पढ़ते थे । सुनार के बच्चे जहां ट्यूसन पढ़ने जाते थे । वह टीचर हमारे मामा का दोस्त था । उसका नाम भल्ला सर था । भल्ला सर हमें फ्री में पढ़ाते थे ।       एक दिन सुबह के समय मैं अकेला घूमते हुए करीब 1 किलोमीटर दूर एक पुरानी राजा की गढी पर पहुंच गया । वहां पर मुझे सुनार के बच्चे खेलते हुए नजर आए । मैं भी उनके साथ खेलने लगा । हमने मामा और नानी से सुना था कि राजा की गढ़ी पर भूतों का बसेरा है । हमारी नानी बताया करती थी कि पुराने समय में गड़ी में एक राजा और रानी रहा करते थे । एक बार उनके छोटे भाई ने छल से अपने छोटे 7 साल के पुत्र को एक खीर के कटोरे में जहर मिलाकर दे दिया था । जिसे राजा और रानी ने छोटे वालक और अपने छोटे भाई पर विश्वास करके दोनों ने बिना कोई संकोच किए खा लिया था । जिससे दोनों की जान चली गई । छोटे भाई ने चुपके से गड़ी में ही दोनों को पीछे खाई की तरफ रात में दफना दिया था । वह राजा और रानी खतरनाक भूत बन गए हैं । और जो बच्चा वहां आ जाता है वह बिना मरे वहां से नहीं जाता । वहां पर आए दिन बच्चे मरे हुए मिलते रहते थे । हमारी नानी और मामा ने हमें वहां जाने से मना कर दिया था । लेकिन हमें पता नहीं था कि वह राजा की गढ़ी कहां पर है । और हम वहां कभी गए नहीं थे । हम खेलते हुए उसे गढी में भीतर प्रवेश कर जाते हैं । तभी मुझे कहीं से किसी के जोर जोर से हंसने की आवाज सुनाई देती है । मेरे ऊपर कुछ चक्कर सा हो गया । मैं ऊपर देखता हुआ सीधे खाई की तरफ चला जाता हूं । मुझे पता नहीं चल रहा था मैं कहां जा रहा था । और अचानक से उस खतरनाक खाई में गिर गया था । लेकिन संयोगवश उस खाई में 10-15 फुट नीचे  एक पीपल का पेड़ खाई की दीवाल में से उगा था । जो बहुत पुराना और घना था । मैं उसी पीपल के पेड़ में जाकर अटक गया ।  कुछ लोग वहां बैठकर बातें कर रहे थे । उन्होंने मुझे गिरते हुए देख लिया था । वे लोग तुरंत ही दोड़कर मेरे पास आए । और एक आदमी ने पीपल के पेड़ के पास पहुंचकर मुझे पकड़ लिया और दूसरे से रस्सा लाने को कहा । अब मैं होस में था । एक आदमी ने रस्सी से उतर कर पीपल के पेड़ से मुझे गोद में पकड़कर नीचे उतारा था । मुझे वो दिन आज भी याद है । उस दिन यदि वह पीपल का पेड़ ना होता तो मेरी जान नीचे पत्थरों पर गिरकर चली जाती । मेरी जिंदगी बचाकर सब लोगों ने मुझसे कहा कहां से आया है । तो मैंने कहा मेरे सभी दोस्त कहां है । वो लोग मुझ पर हंसने लगे और मुझसे कहा अपने घर जा किसका लडका का है तू । यहां तू अकेला आया है । अब एक काम कर उस राजा रानी द्वारा बनाए गए राम मंदिर में जाकर भगवान से यह कह दे कि मेंं एक अच्छा लड़का हूं । मैंने राजा रानी को जहर नहीं दिया है भगवान जी । राजा रानी को बता दो । उन लोगों ने मुझसे कहा था मैंने वैसा ही किया । फिर उन लोगों ने मुझसे घर जाने को कहा । और मुझे थोड़ी दूर तक छोड़कर वो चले गए । मैं अपने मामा के घर आ गया । मैंने किसी से कुछ नहीं कहा था । मेरे हाथ और पैर में थोड़ी सी चोट लग गई थी उस से थोड़ा सा खून निकला था । उस दिन में चुपचाप दिन के समय सो गया । जब शाम के 4:00 बजे तो नीचे से सुनार के लड़के मुझे ट्यूसन पर जाने के लिए बुलाने आए । मैं चुपचाप किताब लेकर ट्यूशन के लिए चला गया । लेकिन मैं उनसे बोल नहीं रहा था । 1 घंटे बाद ट्यूशन से छुट्टी हो गई । तो सुनार के लड़कों ने मुझसे कहा गब्बर तू आज हमसे बोल क्यों नहीं रहा है क्या हो गया है तुझे । मैंने उनसे चुपके से कहा खाई में धकेल कर यहां आ गए । अब कहते हो कि बोल क्यों नहीं रहा है । बड़े शातिर बच्चे हो तुम । वह लोग कहने लगे क्या कह रहा है तू । हमारी समझ में नहीं आ रहा है ।  हमने तुझे कब खाई में धकेला था । मैंने कहा आज दोपहर 12:00 बजे तो उन्होंने मुझसे कहा गब्बर मेरे साथ मेरे घर आना । मैं उसके घर चला गया । उसने अपनी मम्मी से कहा मम्मी हम दोनों भाई आपके और पापा के साथ आज सुबह 8:00 बजे कहां गए थे । उनकी मम्मी ने कहा शीतला माता के मंदिर गए थे । दूसरे भाई ने पूछा वहां से हम कितने बजे वापस आ गए थे । तो उनकी मां बोली करीब 3:30 बजे आए थे । वहां से आकर तुम सीधे ट्यूशन के लिए चले गए थे । दोनों ने कहा अब तो ठीक है । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि कौन सही है और कौन गलत है । लेकिन मैंने उनकी बातों पर विश्वास कर लिया था । लेकिन वह बात मैंने आज तक किसी को नहीं बताई थी । क्योंकि बताता तो मेरी पिटाई होती कि तू वहां क्यों गया था । दूसरे दिन हमारी मां ने घर आने का प्लान बना लिया । मेरे मामा ने मुझे अपने यहां ही रहने के लिए कहा मैं रहने के लिए तैयार हो गया । मेरी मां बड़े और छोटे दोनों भाइयों और छोटी बहन को लेकर अपने घर ससुराल पहुंच जाते हैं । तीनों घर आ जाते हैं । और मेरा बड़ा भाई राजेश चुपचाप पापा की साइट रहने चला जाता है । लेकिन मुझे पता ही नहीं चल पाता कि किस कारण से वह पापा के साथ रहने के लिए गया था । एक महीने बाद मां फिर से मामा के यहां पर रहने के लिए आ जाती है । मैंने देखा राजेश नहीं आया है । मैंने मां से पूछा मां ने बताया वह तो तेरे पिता के साथ रहने लगा है । मैं शांत रह गया । हम सभी बच्चे खेलने में व्यस्त थे । लेकिन हमारे ट्यूशन का समय हो गया था हमारे मामा के दोस्त भल्ला सर हमें फ्री ट्यूशन पढ़ा तो देते थे लेकिन मार भी बहुत दे देते थे । राजीव उससे बहुत डरता था । वह भल्ला सर के डर से ही मामा का घर छोड़ कर गया था । भल्ला सर से डरता तो मैं भी था । डर के मारे सबसे पहले मैं ट्यूसन का काम करता था । उसे दिन राजीव आया था तो मैंने खेलने में ट्यूशन के काम का ध्यान नहीं दिया था । और उस दिन मेरा ट्यूशन का काम नहीं हो पाया था । जब ट्यूशन का समय हो गया तब मुझे यह बात पता चली । मैं बिलबिलाने लगा । इसलिए राजीव ने कहा एक काम करते हैं । गब्बर आज तुम्हारा ट्यूशन का काम नहीं हुआ है और आज मैं भी आ गया हूं तो तुम मुझे भी ट्यूशन जाना पड़ेगा । एक काम करते हैं बाजार घूमने निकल चलते हैं । ट्यूशन का टाइम खत्म हो जाएगा तब आएंगे । मुझे भी यह आईडिया सही लगा । हम रेलवे स्टेशन की तरफ ट्रेन देखने चल दिए । जैसे हम रेलवे स्टेशन पर पहुंचे । थोड़ी देर बाद ट्रेन आ गई । हमें उस समय ट्रेन देखना बहुत पसंद था । हम बहुत खुश होकर ट्रेन को देख रहे थे । तभी अचानक ट्रेन में से ट्यूशन वाले सर हमको उतरते हुए दिखे । हम एकदम से डर गए । और हमसे पूछा यहां क्या कर रहे हो । क्या आज ट्यूशन नहीं जाना क्या । और राजीव कब आ गया । तो मैंने कहा सर राजीव आज ही आया है । और मम्मी ने गेहूं का बीज तलाशने के लिए कहा है इसलिए हम यहां आए हैं । सर का घर रेलवे स्टेशन से करीब 500 मीटर दूर था । उन्होंने हम दोनों को अपने साथ एक रिक्शा में बैठा कर उनके घर आ गए । घर पहुंचे तो 4:00 बज चुके थे और ट्यूशन का समय हो गया था । अब भल्ला सर ने हमसे कहा जल्दी से अपनी कॉपी लेकर आओ । लेकिन मेरा तो काम हुआ नहीं था । मैं कॉपी लेकर आया । उस दिन मुझमें चार पांच चांटे पड़ गये । बचपन में मेरा छोटा भाई राजीव मुझसे बहुत प्यार करता था मामा कुछ खाने की चीज लाते और सभी को बराबर बराबर देते थे । राजीव अपने हिस्से में से अलग से मुझे खाने को देता था । बड़ा भाई राजेश भी मुझे बहुत चाहता था । जब मम्मी को मामा के यहां रहते हुए एक महीना बीत गया तो 1 दिन हमारा बड़ा भाई राजेश मामा के यहां हमें देखने आया हमने खूब मस्ती की छत पर क्रिकेट खेले तो अचानक से हमारी गेंद पीछे की तरफ चली गई वहां पर कचरा फेंकते थे । और नाले की बहुत गंदगी रहती थी । तो वहां पर कोई जाता नहीं था । और हम दोनो छोटे भाइयों को वहां जाने से डर लगता था । वहीं पर हमारी पहले की एक दो गैंद और पड़ी हुई थी । बड़ा भाई राजेश गेंद को लेने के लिए बिना मम्मी को बताए चला गया । और सभी गेंदों को ले आया । हमें उस दिन बहुत खुशी हुई थी । फिर हमने छत पर खेलना बंद कर दिया कि गेंद दोबारा चली जाएगी । ऊपर कमरे में बैठकर ख़ूब सारी घर की  की बातें करते रहे । उसने कहा मम्मी मैं यहां पर शक्कर की कहने आया हूं । कंट्रोल से शक्कर आ गई है । अपनी शकर को अपने कमरे में रख आओ । मम्मी ने मुझे कमरे की चाबी दे दी । और वहां पर खेलकूद कर 2:00 बजे के समय राजेश और में गांव की तरफ चल दीए । गांव में आकर हम दोनों भाई पहले तो क्रिकेट खेले फिर हम गिल्ली डंडा खेले । धीरे-धीरे शाम होने का समय आया तो गुलजार चाचा ने शक्कर तोल दी । मैंने कमरे का ताला खोलकर  कुकर में शक्कर रख ली । और उसका ढक्कन लगाकर भीतर अलमारी में रख दिया । फिर मैंने कमरे का ताला लगा दिया । फिर मेरा बड़ा भाई मुझे बस में बिठाने के लिए ले गया । और मुझे बस में बैठा दिया । मैं दोबारा से मामा के घर पहुंच गया ।  और मम्मी को बता दिया कि शक्कर कुकर में रख आया हूं । मम्मी ने कहा ठीक है दो-तीन दिन बाद यहां से चलेंगे फिर देख लेंगे । मामा के पड़ोस में रहने वाले सभी लोगों को यह बात पता चल गई । कि इनके घर वाले इन्हें बहुत दुखी कर रहे हैं ।  इसलिए अपने मायके में यहां रहती है । तो पड़ोस में सभी अच्छे लोग थे । पड़ोस की एक औरत ने कहा ननद जी मैंने अपने आदमी से आपके इन दोनों बेटों को दुकान पर रखने के लिए बात कर ली है । आप इन दोनों को दुकान पर भेज दिया करो । मैं और राजीव दोनों उस पड़ोस वाले धम्मा मामा की दुकान पर जाने लगे । जब एक महीना हुआ तो उन्होंने हमारी मां को 100 रुपए दिए । जिससे हमारी मां  बहुत खुश हुई । लेकिन हमारी नानी हमारे ज्यादा दिन तक वहां रहने से जलने लगी थी । वह हमारी मां पर जरूरत से ज्यादा काम कराती थी । खुद कुछ नहीं करती थी । सुबह से लेकर शाम तक के सारे काम हमारी मां करवाती थी । इतना सारा काम करने के बाद भी वह हमारी मम्मी और हमसे गालियां देती थी । जो हमसे सहान नहीं होती थी । लेकिन हम कर भी क्या सकते थे । हमारी मां चुपचाप गाड़ियों को सहन करके काम करती जाती थी । एक दिन दोपहर के समय हम दोनों भाई दुकान पर से खाना खाने नानी के यहां आए । तो नानी ने शाम की खराब हो चुकी रोटी सब्जी हमें खाने को दे दी ।  जिसका हमारी मम्मी को पता था कि यह खाना खराब है । तो हमारी मां ने नानी से कहा कि मम्मी यह रोटी खराब हो चुकी है । इनको खाने से मेरे बच्चे बीमार हो जाएंगे । तो नानी बोली तुझे ज्यादा दिखता है क्या ? अच्छी रोटी रखी हैं उन्हें खराब कहती है । तो एक रोटी उठाकर हमारी मां उस औरत के पास जाती है जिसकी दुकान पर हम दोनों भाई काम करना सीख रहे थे । वह औरत कहती है नन्द जी ये रोटी तो खराब है इनको बच्चों को मत खाने दो । अभी मैं रोटी बना देती हूं बच्चों को यहां ले आओ । यहां खा लेंगे ‌। मम्मी बापस नानी के यहां आ जाती हैं । पीछे से है वह औरत आ जाती है । जिसकी दुकान पर हम काम करने जाते थे । वह कहती है क्यों अम्मा यह बच्चों को क्या जहर खिला रही है ? तू नानी कहती है क्या हो गया और क्यों बड़बड़ा रही है ? हमारी मां हमें चुपचाप वहां से उठाकर ले जाती है । मेरे सेठ की घरवाली हमारे लिए रोटी बनाती है हम दोनों भाई अच्छे से खाना खाकर दुकान की ओर चले जाते हैं । उस दिन ही हमारी मां वहां से अपने ससुराल की ओर आ जाती है । अब हम रोज सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर अपने घर से ही बस से रोज दुकान पर जाने लगते हैं । अगले महीने हमें ₹150 तनखा मिलती है । उस समय बस से हम दोनों का ₹1 दोनों के 50 50 पैसे एक तरफ का किराया लगता है । हम घर से सुबह 6:00 बजे ही नहा धोकर निकल जाते थे । हम घर से सिर्फ गैंहू के आटे की रोटी लेकर आते थे । और उन रोटियों को दुकान वाले के घर पर रख देते थे । दुकान वाले की घरवाली हमें अपने बेटों से भी ज्यादा प्यार करती थी । दुकान वाले की घरवाली हमें रोज रोटी पर लगाने के लिए घी देती थी । हर रोज वह हमैं सब्जी भी देती थी इतना ही नहीं वह जो कुछ भी बनाती है वह हमारे लिए अवश्य रखती थी । हम खाना खाकर दुकान पर चले जाते थे । बर्तन भी वो खुद ही धोती थी । जब हम खाना खाते तो सभी कामों को छोड़कर हमारे साथ ही बैठ जाती थी । और हमें अच्छा ठंडा फ्रिज का पानी पीने को दे दी थी । बड़े प्यार से हमारे सिर पर हाथ फेरती थी । और कहती थी तुम्हें कभी भी किसी भी चीज की जरूरत पड़े अपनी मामी को बोल देना । उनके दो बच्चे और एक बच्ची थे । एक बच्चा बड़ा और एक छोटा था बच्ची बीच वाली थी ।  जो हम से करीब 7 साल बड़ी थी । छोटा बच्चा मुझसे करीब 3 साल बड़ा था । उनके बच्चे भी हमसे कभी नहीं जलते थे । और हमें अपना ही छोटा भाई समझते थे । हम करीब 12:00 और 1:00 के बीच में खाना खाने आते थे । कभी-कभी उनकी घरवाली नहीं होती तो उनकी बेटी भी हमको बड़े प्यार से बिठाकर अच्छे से खाना खिला देती थी । शुक्रवार के दिन बाजार बंद रहता था । उस दिन हम उनके घर पर रहकर खूब मस्ती करते थे । उनके यहां किसी भी कमरे में हम चले जाते थे लेकिन कोई कुछ नहीं कहता था । उनके बेड पर और उनकी टीवी में खूब गेम खेलते रहते थे । इस तरह हमारा समय बीत रहा था । राजीव और में हम दोनों भाई धीरे-धीरे दुकान के कामों में होशियार होते जा रहे थे । तो उनकी दुकान पर काम करने वाला पुराना नौकर हम दोनों भाइयों से जलने लगा था । एक दिन उसने हम दोनों भाइयों को दुकान से हटाने का प्लान बनाया । उसने कहा सेठजी यह दोनों बालक अपनी दुकान से खिलौनों को अपने दोस्तों को दे देते हैं क्योंकि इनका बड़ा भाई राजेश और इनके दोस्त तुम्हारे पड़ोस में रहने वाले सुनार के बच्चे दुकान पर अक्सर मिलने आते रहते है । कल इनके पास रिमोट वाली कार थी । दोपहर के समय तुम्हारा लड़का शनि और यह दोनों खेल रहे थे । और आज वह मिल नहीं रही है । कल दुकान में चला रहे थे । इस तरह का झूठा इल्जाम लगाया । आज सुबह जब में आया था तब तुम दुकान में अन्दर थे । और ये पैसों के गल्ले में हाथ डाल रहा था । सेठ ने नौकर की बात पर विश्वास कर लिया । और उसने तुरंत मुझे आवाज लगाई ए गब्बर ! इधर आना । मैं तुरंत पहुंचा । और मैंने कहा क्या कह रहे हो मामा जी । उन्होंने मुझसे कहा अपनी जेब दिखाना । मैंने सेठ को अपनी सभी जेब दिखाते हुए कहा मामा में घर से 50 पैसे के दो सिक्के यानी कि ₹1 किराए के लिए लाया था । जिसमें से 50 पैसे मेरे सुबह जब में घर से आया था तब बस में किराए में खर्च हो गए 50 पैसे बचे हैं जो मेरी जेब में पड़े है । मैंने उसे अपनी जेब दिखा दी । 50 पैसे के अलावा मेरी जेब में कुछ नहीं निकला था । सेठ ने भी मुझसे कुछ नहीं कहा । नौकर ने कहा सेठ जी कल में तुम्हें हकीकत दिखाऊंगा तब तुम्हें विश्वास होगा सेठ ने कहा ठीक है । दूसरे दिन सेठ जानबूझकर अंदर बैठ गया और वहां से छिपकर हम दोनों भाइयों को देखने लगा । तभी अचानक एक ग्राहक आया और वह धागे की नलकी मांगने लगा । उस समय बड़ी नलकी जिसे (धागे की रील) एक रुपए 50 पैसे की आती थी उसने मुझे 10 का नोट दिया । सेठ अंदर से मुझे छिपकर देख रहा था । मैंने कहा मामा जी इन्होंने दो नलकी ली है मुझे 10 का नोट दिया है । उसने कहा मैं भीतर हूं । मुझे नहीं पता तू ₹7 वापस कर देना । मैंने 10 के नोट को पेटी में अंदर डाल दिया और ₹7 बापिस कर दीए । थोड़ी देर बाद सेठ आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया । और उसने मुझसे ₹5 के  पोआ बाजार से लाने के लिए कहा । सेठ ने थोड़े से हाथ में लिए और बाकी सब मुझे खाने को दे दिए । मैं पोआ खा रहा था । तब तक नौकर आ गया । सभी अपने-अपने काम ग्राहकों को सामान दिखाने में लग गए । गर्मियों का मौसम था । दोपहर के समय में सेठ का लड़का दुकान पर आया । और उसने अपने पापा को खाना खाने के लिए घर भेज दिया । जब सेठ खाना खाने चला गया । तो नौकर ने दुकान में से ₹5 के इंदिरा गांधी के पोस्ट ऑफिस के 20 टिकट निकाल कर मेरी जेब में रख दिए । और मुझसे कहा कि 1:00 बजे तू मुझे तहसील में मिलना । वहां पर चुपचाप मुझे इन टिकटों को देने आ जाना । और हां इस बात की चर्चा किसी और से मत करना । बाथरूम का बहाना लेकर मेरे पास आ जाना । में जा रहा हूं । हमारी दुकान तहसील चौराहे पर ही थी । दुकान से तहसील करीब 100 मीटर दूर थी । उस समय में बहुत छोटा था । नौकर की दुष्टता को समझ नहीं पाया । जैसा नौकर ने मुझसे कहा था मैंने वैसा ही किया । 1:00 बजे के समय जब मैं सेठ के लड़के से बाथरूम की कहकर तहसील में पहुंचा । तो सेठ और नौकर दोनों वहां बैठे थे । और सेठ ने मुझसे कहा अपनी जेब दिखाना । मैंने उसे जेब दिखाएं । तो मेरी जेब में इंदिरा गांधी के 20 टिकट निकले । उसे टिकटों के बारे में सही बताया । तो पास में बैठे नौकर ने सेठ से कहा यह झूठ बोल रहा है । इन टिकटों को यह दुकान से चुराकर यहां पर बेचने के लिए लाया है । तभी अचानक वहां एक आदमी आ जाता है । और वह कहता है आज कितने रुपए के मार लाया है ।  इतना कहते हैं सेठ मुझे जोर से थप्पड़ मारता है । और अभी जल्दी से दुकान पर आने को कहता है । मैं जैसे ही दुकान पर पहुंचता हूं । वह मुझे वहां से निकलने के लिए कहता है । मैं चुपचाप चप्पल पहनकर घर के लिए चलने लगता हूं । तो मेरा छोटा भाई राजीव भी सेठ से घर जाने की पूछता है सेठ कह देता है तू भी जा चल । इस तरह हमारी अच्छी खासी नौकरी चली जाती है । और हम दोनों भाई निरास होकर दोपहर के समय में ही अपने घर आ जाते हैं । घर पर हमसे मम्मी पूछती है आज जल्दी घर क्यों आ गए । तो मैं उन्हें सारी बात बता देता हूं । मम्मी कुछ नहीं बोलती शांत रहती है । दो-तीन दिन के बाद फिर हमारी मां हम तीनों को लेकर मामा के यहां जाती है । और दुकान वाले की घरवाली से मिलकर हमारे हटाने का कारण पूछती है । दुकान वाले की घरवाली हमारी मां को सारी बात बता देती है । पूरी बात को सुनकर मेरी मम्मी मुझ पर बुरी तरह भड़क जाती है और वहीं पर एक डंडे से मेरी पिटाई शुरू कर देती है दुकान वाले की घरवाली को सही नहीं पता था कि सत्य क्या है । और गलत क्या है । हम एक गरीब परिवार के बच्चे थे इसलिए सबको हम ही गलत लग रहे थे ।  इतना होने के बावजूद भी दुकान वाले की घरवाली ने हमारी मां को मुझे दुबारा से दुकान पर लगाने के लिए आश्वासन दिया । उसने हमारी मां से कहा मैं आज रात को इनसे से बात करूंगी । दूसरे दिन सेठ की घरवाली के ज्यादा कहने पर सेठ अकेले मुझे ही दुबारा से दुकान पर लगाने के लिए तैयार हो जाता है । मैं फिर से दुकान पर जाना शुरू हो जाता हूं । अबकी बार पहले दिन से ही वो सेठ मुझसे गधा मजबूरी करवाने शुरू कर देता है । सेठ ने कंट्रोल के एक सरकारी आदमी से मिलकर केरोसिन बेचने का धंधा शुरू कर दिया था । वह कंट्रोल से सस्ते दामों में केरोसिन खरीद कर उसे बाजार में महंगे दामों में बेचने लगा ।  सेठ मुझे रोज की 100 लीटर केरोसिन घर तक पहुंचाने के काम के अलावा घर वाले तीन गोदामों से दुकान का सारा सामान लोडिंग की जगह मुझसे मगाना शुरू कर देता है । मैं थोड़ा थोड़ा करके पूरे दिन ढोता रहता हूं । पहलै तो सुबह घर से जाकर सेठ के लड़के को अपने साथ ले जाकर दुकान को खुलवाता हूं । फिर पूरी दुकान को में अन्दर से फटकार के झाड़ू लगाता हूं । उसके बाद पूरी दुकान में हाथ में कपड़ा लेकर उससे पोंछा लगाता हूं । फिर दुकान  के बाहर झाड़ू लगाकर वहां पर दूर टंकी से पानी लाकर छिड़काव करता हूं । तब तक सेठ आ जाता है फिर उसके बाद दुकान से बाहर सामान जमाता हूं । इस तरह दुकान पूरी तरह खोलते हुए 10 बज जाते हैं । फिर मैं घर से सेठ के लिए फ्रीज की पानी की बोतल और नाश्ता लेने जाता हूं । तब तक कैरोसिन वाली कंट्रोल खुल जाती है । फिर सेठ मुझे 10 लीटर की कैन हाथ में देते हुए कहता है । इसे ले जाकर कंट्रोल वाले के यहां चले जाओ ।  उससे कहना कि मुझे धम्मा सेठ नहीं भेजा है । मैं कैन ले जाकर कंट्रोल वाले के यहां पहुंचा । जैसा मुझसे सेठ ने कहा था वैसा ही मैंने जाकर कंट्रोल वाले को कह दिया कि मुझको धम्मा सेठ ने भेजा है । उस तेल बांटने वाले ने मेरी तरफ देखा और मेरे हाथ से प्लास्टिक की कैन को लेकर उसमें 10 लीटर तेल भर दिया । और मुझसे कहा ले जाओ । उस समय मेरी उम्र करीब 10 वर्ष थी तो मुझसे वह 10 लीटर की कैन उठ नहीं रही थी । मैं उसको जबरदस्ती दोनों हाथों से पकड़ कर धीरे धीरे दुकान तक लाया । तो सेठ ने मुझसे कहा कि इसको घर ले जाओ और खाली कराकर ले आना । में धीरे-धीरे दोनो हाथों से पकड़ कर सारे बाजार में रखते हुए उस कैरोसिन को सेठ के घर तक ले गया और उसे खाली करने के लिए कहा सेठ की घरवाली ने उस कैन को एक ड्रम में खाली कर दिया । और मुझे खाली कैन देदी । मैं उस कैन को लेकर दुकान पर पहुंच गया । तो सेठ ने मुझसे कहा फिर चले जाओ मैं दोबारा गया और फिर से कैन को केरोसिन से भराकर लाया । और धीरे धीरे घर तक पहुंचाया । इस तरह उस दिन मेने साम तक 10 कैन घर तक पहुंचायी थी । उस दिन सेठ ने खुश होकर मुझे 2 रूपए अलग से बाजार में कुछ चीजें खाने के लिए दिए थे । लेकिन मैंने रुपए लेने से मना कर दिया । फिर उन्होंने मुझू ₹1 देकर कहा कि बाजार से गन्ने का जूस पी लेना । और उन्होंने मुझे जबरदस्ती दे दिया । उस समय हम बहुत गरिब थे । कभी कभी हमसे बस वाले बच्चे समझकर किराए के पैसे नहीं लेते तो हम उनको ढेरों दुआऐ देते थे । और उन 50 पैसों को बड़ी खुशी से अपनी मां को वापस देते थे ।  उस दिन मेने वह रुपया अपनी मां को  घर जाकर दे दिया था । तो मां ने सोचा कि कहीं यह चोरी तो नहीं कर लाया । तुरंत ही मां दूसरे दिन घर से मामा के यहां आई । मुझे बताया नहीं कि मैं आज जाऊंगी । और मेरी मां ने उस एक रुपए के सिक्के की सारी बात सेठ की घरवाली को बताई । तो वह बोली मुझे पता नहीं अभी वह खाना खाने आएंगे तो मैं उनसे पूछ लूंगी । तभी मैं दुकान का सामान लेने के लिए घर पहुंचा तो मुझे वहां पर मेरी मम्मी दिखीं । मैंने कहा मुझे क्यों नहीं बताया । तुम आ जा रही हो। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा । तभी अचानक सेठ की घरवाली ने मुझे आवाज देते हुए कहा गब्बर मामा से जाकर यह कह दो के जल्दी से खाना खाने घर चले जाओ तुम्हें मामी ने बुलाया है । कुछ देर बाद सेठ खाना खाने चले जाते हैं । फिर मेरी मां उनसे पूछती है । तो उसे हंसी आ जाती है । और कहता है हां कल ₹1 मैंने उसे जूस पीने के लिए दिया था । तो मेरी मां को संतुष्टि मिलती है । तो सेठ की घरवाली कहती है कि बच्चों को पैसे मत दिया करो  पैसे देने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। पैसे देना है इनको दिया करो । सेठ ने कह दिया ठीक है अब नहीं दूंगा । इस तरह से हमारी जिंदगी व्यतीत हो रही थी लेकिन यह बात हमारे पिताजी गुलाब को पता नहीं थी के उनके बेटा गब्बर दुकान पर काम कर रहा हैं । एक दिन मेरे पिताजी गुलाब बाजार में उस दुकान के सामने से निकले जहां में काम कर रहा था । उन्होंने उनसे पूछा यहां क्या कर रहा है । मैं उनसे बोला नहीं चुपचाप खड़ा रहा । तो उन्होंने फिर पूछा मेने कहा कुछ नहीं वैसे ही खड़ा हुआ हूं । मैं उनसे चिल्ला कर बोला । उन्होंने मुझसे कहा कमीन को बोलने का तमीज नहीं है । उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा और वहीं पास में एक दुकान पर जाकर अपना काम कराने के लिए बैठे थे । तभी हमारे दुकान वाले सेठ ने मेरे हाथ में 10 लीटर की कट्टी देते हुए कहा कि कंट्रोल से इसे  कैरोसिन से भरवा कर घर रख आओ । मैं कट्टी लेकर चला गया । कंट्रोल के सामने ही पापा बैठे थे । मैंने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया । मैं कंट्रोल से 10 लीटर की  केरोसिन की कैन को भरवाकर दोनों हाथों से लटकाए हुए धीरे धीरे भीड़ में से बाहर निकल रहा था । फिर मैं बाहर आ गया । और धीरे-धीरे उसको बाईपास वाली गली में से निकालते हुए उनके घर ले जाने लगा । पीछे से मेरे पिताजी मुझे देखते हुए मेरे पीछे आ रहे थे । मैं बड़ी मुश्किल से दोनों हाथों से पकड़कर रख रख कर उस कट्टी को घर तक ले जा रहा था । यह देख कर मेरे पापा गुलाब को बहुत दुख हुआ । वे पढ़े लिखे इंसान थे । उन्होंने इंग्लिश से डबल M.A. की थी । लेकिन उनकी नौकरी नहीं लग पाई थी । उस समय हमारी उम्र पढ़ने की थी पढ़ने लिखने की थी ।  हम शरीर से भारी काम कर रहे थे । तो उन्होंने उस कट्टी को ले जाते हुए मुझे देखा धीरे-धीरे करके मैं उस कट्टी को लेकर सुनार के घर पहुंच गया । फिर वह वहां से वापस आ गए । और अपना काम करवाने लगे । फिर थोड़ी देर बाद भी केले लेकर मेरे पास आए और मुझे दो केले दे दिए मैंने उन्हें खा लिया ।  लेकिन वे मुझे इस तरह मुझे काम करते हुए देखकर बहुत परेशान थे । लेकिन उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा था । वे चुपचाप वहां से चले गए । एक दिन रविवार था । उस दिन कंट्रोल की छुट्टी थी । उस दिन मैं दुकान पर काम कर रहा था । एक ग्राहक को कांच का एक गुलदस्ता दिखा रहा था । कि अचानक मेरे हाथ से वह गुलदस्ता गिर गया । और वह टूट गया । तभी सेठ ने कहा निकल जहां से बत्तमीज मुझे तेरी जरूरत नहीं है । मैं अपनी चप्पल पहकर वहां से घर के लिए आ गया । तभी विधानसभा के चुनाव थे । चुनाव की तारीख 7 दिन बाद थी । अगले दिन सुबह से ही बस बंद हो गई । में सुबह नहा धोकर तैयार होकर बस देखने लगा । लेकिन मुझे 2 घंटे तक बस नहीं मिली । उस दिन से 7 दिन तक में दुकान पर नहीं गया । चुनाव की वोटिंग होने के बाद अब सभी बस चालू हो गयी थी । तो फिर मेरी मां ने मुझसे दुकान पर जाने के लिए कहा । मैं 7 दिन से नहीं गया था । तो मैंने मम्मी से कहा कि तुम मेरे साथ चलो धम्मा मामा मुझसे डांट लगाएगा ।  कि इतने दिनों से कर्मों नहीं आया था । मां ने कहा दो-तीन दिन बाद मैं चलूंगी तुम मेरे साथ चलना । मैंने कह दिया ठीक है मैं तुम्हारे साथ ही चलूंगा । सुबह सुबह उठकर मैं बाहर जाकर खेल रहा था । बाहर ही मेरे पिताजी बैठे थे । उन्होंने देखा सुबह-सुबह सामने सड़क से बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल जा रहे हैं । मैं वहां पर खेल रहा था । तो उन्होंने मुझे कहा गब्बर बहुत दिन हो गए तू स्कूल नहीं गया चल तुझे स्कूल छोड़ कर आता हूं । में बिना कुछ बोले चुपचाप वहां से भीतर आ गया । कुछ देर बाद वो भी वहां से उठकर हमारे दरवाजे पर आकर बोले - गब्बर चल जल्दी फटकार स्कूल के लिए तैयार हो । मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था ।  लेकिन मैंरे पिताजी गुलाब स्कूल जाने की जिद कर रहे थे । मैं चुपचाप अपनी मां के बगल से जाकर एक कोने में बैठ गया । थोड़ी देर तक इंतजार करने के बाद उन्होंने खुद अंदर आकर मेरा स्कूल का बैग को तलाशने लगे । कुछ देर के बाद उनको मेरा स्कूल बैग मिल गया । उन्होंने स्कूल बैग को खुद अपने हाथ में लेकर जोर से कहा चल स्कूल फटाफट  । लेकिन मैं नहीं बोला । फिर वे मैं व़ो स्वेम मम्मी के पास आ गए । और जबरदस्ती मेरा हाथ पकड़कर मुझे वहां से खींच कर उठा लिया । मैं जोर जोर से रोने लगा । और स्कूल नहीं जाने के लिए कहने लगा । मम्मी ने भी मना किया था । वह स्कूल नहीं जा रहा है उसे छोड़ दो । लेकिन पापा नहीं माने उन्होंने कहा तू शांत चुपचाप बैठी रह । तूने ही इन सभी को बिगाड़ा है । मैं आज इसे स्कूल ले जाकर रहूंगा । कैसे नहीं जाएगा स्कूल पढ़ने । उन्होंने मेरे स्कूल बस्ते को अपने कंधे में डाल लिया और एक हाथ से मुझे पकड़ा और दूसरे हाथ में डंडा लेकर मुझे पीटते हुए स्कूल ले जाने लगे । मैं बहुत ज्यादा रो रहा था । और कह रहा था कि मुझे कल से दुकान पर जाना है । में स्कूलू नहीं जाउंगा । मम्मी ने कहा उसको छोड़ दो । लेकिन पापा नहीं माने उन्होंने मुझ में डंडे देने शुरू कर दिए । डंडा से मारते हुए मुझे स्कूल तो ले गए । लेकिन स्कूल से वापस लौट कर घर आए तो देखकर दंग रह गए । बड़े भाई राजेश ने कहा कि पापा मम्मी कुएं में गिर पड़ी है । उसे जल्दी बाहर निकालो । पापा ने जैसे ही कुएं में देखा तो यह बात सच थी । उन्होंने जोर जोर से गांव के लोगों को मदद के लिए आवाज लगाई । आवाज लगाते ही बहुत से लोग इकट्ठे हो गए । और तुरंत ही कुछ लोग रस्सी के सहारे कुएं में घुस गए । किसी भी तरह उन्होंने मेरी मां को कुऐ से जिंदा बाहर निकाल लिया । बाहर निकालने के बाद पिताजी मुझ को लेने स्कूल में गए और मुझे स्कूल से वापस घर ले आए । लेकिन उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया । शाम को मम्मी को अच्छे से होश आ गया था । और वह हम सभी बच्चों से अच्छी तरह बातें कर रही थी । तभी पापा वहां पर आए । और मम्मी से बोले तुझे क्या चाहिए एक बार तो हमसे बोला होता हम नहीं लाते तो तू हमसे कहती । बिना बोले हमको क्या पता कि तुझे क्या चाहिए तू क्यों परेशान है । तो मम्मी ने चिल्लाते हुए कहा तुम्हें पता नहीं चार चार बच्चों का खर्चा कहां से चलाऊं ? इन्हें जहर देकर मार दूं ? या फिर खुद ज़हर खा लूं । तुम्हारे बच्चे तो यह है ही नहीं यह तो मेरे ही तो है ? मुझे ही तो इन्हें किसी तरह पालना है । पिताजी समझ गए कि बच्चों के खर्चे से परेशान है इसलिए इसने अपने बच्चों को बनिया की दुकान पर लगाया है । खर्चे से परेशान होकर ही इसने यह खतरनाक कदम उठाया है? तो उन्होंने कहा ठीक है मैं अभी बाजार से सारा सामान लेकर रख देता हूं । और किसी चीज की तुझे जरूरत पड़े तो मुझे बोल देना । मैं किसी भी तरह तुझे लाकर दूंगा । लेकिन बच्चों को बनिए की दुकान पर काम करने के लिए मत भेजना । जिसमें मेरी भी बेइज्जती होती है । दूसरे दिन पिताजी बाजार से सभी सामान लेकर आए और उन्होंने घर पर रख दिया । थोड़ी देर बाद उन्होंने सभी के लिए खाना बनाया । मां से पूछ कर सभी बच्चों ने खाना खा लिया लेकिन मम्मी ने नहीं खाया । दोपहर के समय मम्मी ने अपने लिए रोटी बनाई और सब्जी बनाकर खाना खा लिया था । शाम के समय पिताजी एक बड़ी सी लौकी लेकर सभी बच्चों के लिए सब्जी बनाने रसोई में आए । तो मां ने उनको देख लिया । गब्बर से कहा पापा से यह कह दो कि दोपहर के समय में आलू की सब्जी बना ली थी वह



भारत में एक छोटे से गांव हमीरपुर में तीन भाई और एक बहन रहते थे । सबसे बड़े भाई का नाम गुलशन था । दूसरे नंबर के भाई का नाम गुलाब था । और तीसरे नंबर के भाई का नाम गुलजारी था । चौथे नंबर की बहन थी , जिसका नाम गुलफाम कली था । गुलशन के दो लडके और एक लड़की थी गुलाब के तीन लड़के और एक सबसे छोटी लड़की थी । तीसरा भाई गुलजारी था । उसके कोई संतान नहीं थी , क्योंकि उसकी शादी नहीं हुई थी । यह उपन्यास गुलाब के दूसरे नंबर के लड़के गब्बर ने प्रेषक बनकर अपना वृत्तांत सुनाया है । जब गब्बर का जन्म हुआ था तब उसके पिता गुलाब अपने बड़े घर को छोड़कर एक अलग से आकर झोपड़ी बनाकर रहने लगे थे । उनके साथ उनकी पत्नी कमला और उनके तीन बच्चे और एक सबसे छोटी बच्ची थी । उनके साथ ही गुलाब के पिताजी गब्बर के दादा भी रहते थे । वह एक सरकारी संस्था में थे । जो रिटायर हो चुके थे । उन्हें ₹5000 पेंशन के मिलते थे । बहन गुलफाम कली नहीं चाहती थी , कि गुलाब का परिवार अच्छा खाए पिए और खुशी से रहे ।

        गुलशन गुलाब और गुलजार की माताजी कामिनी थी । कामिनी के कोई भाई नहीं था । इसीलिए माता जी के माइके की सारी जमीन उनके पिताजी को मिली । जिस जमीन को गुलशन गुलाब और गुलजार की नानी के मरने के बाद जल्द ही उसे बेच दिया गया । और उसी जमीन के जो रुपए आए थे उन्हें तीन भाइयों गुलशन गुलाब और गुलजार मैं बराबर बराबर बांटने के लिए उनके पिताजी ने कहा । लेकिन तीनों भाइयों की लुटेरी बहन गुलफाम कली जिसकी शादी हो जाने के बाद भी उन पैसों से अपना हिस्सा लेना चाहती थी । इस बात को लेकर गुलाब और गुलजार को कोई आपत्ति नहीं थी ।  लेकिन सबसे बड़े भाई गुलशन को आपत्ति थी । गुलशन ने कहा कि सुन बहन गुलफाम कली हमने तेरी शादी कर दी है । अब तेरा यहां कुछ नहीं है । इसलिए नानी के जमीन के रुपया में तेरा कोई हक नहीं है । गुलफाम कली अपने बड़े भाई गुलशन से डरती थी । क्योंकि गुलशन की घरवाली बिल्कुल ही गवार औरत थी । उसे तो बोलने का भी तमीज नहीं था । हर किसी से गालियां देकर बात करती थी । इसलिए उससे सभी डरते थे । गुलशन की घरवाली के मना करने पर गुलफाम कली कुछ नहीं बोली । और चुपचाप बिना कुछ कहे अपने घर ससुराल चली गई । नानी के रूपयों को तीनों भाइयों गुलशन गुलाब और गुलजार ने बराबर बराबर बांट लिया था ।  इन रुपयों मैं गुलफाम कली को कुछ भी हाथ नहीं लग पाया । तो उसे बहुत बुरा लगा । वह इन रुपयों को अपने दो छोटे भाइयों गुलाब और गुलजार को बेवकूफ बनाकर लूटने की योजना बनाने लगी । जो अपनी इस योजना में आखिरकार सफल हो ही गई थी । वह 1 दिन अपने पिता और दोनो छोटे भाईयो गुलाब और गुलज़ार के घर आई । और घडियाली आंसू बहाते हुए बोली कि मुझको ससुराल वाले बहुत परेशान करते हैं । मुझसे यह कहते हैं के तू ससुराल से कुछ लेकर नहीं आई है । और मेरी जिठानी मुझे रोज रोज यह ताने देती है । जिससे मैं तंग आ गई हूं । और पिताजी आपसे मैं सोने के कानो के लिए झुमकी लेना चाहती हूं । क्योकि आपने मुझे शादी में नहीं दिए थे । तो पिताजी ने कहा गुलाब और गुलजार से पूछ ले । गब्बर के पिता गुलाब और चाचा गुलजार थे । गब्बर के पिता सीधे-साधे आदमी थे । और चाचा थोडे से चतुर थे । गब्बर की मां एक होशियार महिला थी । लेकिन उसकी गब्बर के चाचा पर से नहीं चलती थी । जब गब्बर की माता को इस बात का पता चला तो उसने गब्बर के पिता गुलाब को खूब समझाने की कोशिश की । लेकिन उस बिचारी औरत की बिल्कुल न चली । आखिरकार गब्बर के दादा ने कह दिया । कि कोई बात नहीं हमारी छोटी लडकी है और तुम्हारी छोटी बहन है ।  हम इसके लिए जो कुछ करेंगे वह सब पुन्य का काम होगा । इस प्रकार सभी गुलफाम कली की झूठी बातों में आ गए । और उन्हें कई बार सोने की चीज कभी अंगूठी कभी तोरिया कभी बाला बनवाते गए । लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था के गुलफाम कली एक लुटेरी बहन है । इसके बाद यह सिलसिला चलता रहा । फिर गुलशन के बड़े लड़के विक्रम का विवाह तय हुआ । गुलशन और गुलफाम काली दोनों एक जैसी प्रकृति के थे । वे दोनों ही गुलाब के परिवार की खुशी नहीं चाहते थे । जब गुलशन के बेटे विक्रम के विवाह के लिए सगाई हुई तो गुलफाम कली को बहुत अच्छा लगा । वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी । लेकिन संयोगवश कुछ उल्टा हुआ । गुलाब के पिता गब्बर के दादा अचानक से हार्ट अटैक की बीमारी से इस दुनिया से चले गए । एकदम से पूरा परिवार मातम के गम में डूब गया । गब्बर के दादा अपने बड़े भाई गुलशन को चाहते नहीं थे । क्योंकि गुलशन की पत्नी हेमलता बहुत बेकार थी । वह गुलशन से अपने ससुर में रोज गालियां देती और दिलवाती थी । एक बार तो उसने अपने ससुर में अपने भाई शिवकुमार से कह कर जूते दिलवा दिए थे । ऐसे ही रोज-रोज के झंझट से परेशान होकर गब्बर के दादा अपने दो छोटे बच्चों के साथ उस घर को छोड़कर झोपड़ी नुमा एक छोटे से घर में रह रहे थे । अब गब्बर के दादा का दाह संस्कार करना था । इसके लिए गांव के लोगों ने गब्बर के चाचा गुलजारी को कहा ।  गुलजारी चाचा अपने पिता का दाह संस्कार करने के लिए चल दिया । उनका दाह संस्कार हो गया । अब दूसरे दिन गंगा जी के लिए भी गुलजारी चाचा चला गया । इसी बीच गुलशन ने कहा के मैं भी पिताजी के अंतिम संस्कार के कुछ रुपए देने आया हूं कि वे मेरे भी पिता थे । गब्बर के पिता गुलाब ने गुलशन की मीठी बातों पर विश्वास करके अंतिम संस्कार में और ब्राह्मण भोज में सम्मिलित कर लिया । ब्राह्मण भोज हो जाने के कुछ दिनों बाद गुलशन के बेटे विक्रम का विवाह तय हो गया । विवाह की तारीख धीरे धीरे नजदीक आयी । लेकिन अब बहन गुलफाम कली परेशान थी कि वह अब किस से पैसे लूटे क्योकि गब्बर के दादा के मरने के बाद गब्बर के पिता गुलाब और गब्बर के चाचा गुलजार एक साथ तो रहते थे । लेकिन अब उनके पास रोजी रोटी के अलावा ज्यादा रुपया किसी को देने के लिए नहीं था । क्योंकि पहले तो उनके पिताजी को ₹5000 पेंशन मिलती थी । जो मरने के बाद बंद हो चुकी थी । ऐसी परिस्थिति में लुटेरी बहन गुलफाम कली ने अपने भाइयों पर बिल्कुल भी रहम नहीं किया । और अपने भतीजे विक्रम के विवाह में शामिल होने के लिए अपने छोटे भाई गब्बर के चाचा गुलजार को बेवकूफ बनाने का प्लान बनाया । एक दिन गुलजार चाचा किसी काम से अपनी बहिन गुलफाम कली के यहां गए थे । तो गुलफाम कली चाचा गुलजार से कहती है । गुलजार भाई मैंने आपके लिए मुम्बई में एक लड़की देखी है । मैं उससे बात विक्रम के विवाह के बाद करूंगी । गुलजार चाचा खुश हो जाता है और अपनी बहन बनी डायन के झांसे में आ जाता है । बातों ही बातों में भूआ गुलफाम ने चाचा गुलजार से कह दिया कि मुझको 3000 रुपयों की जरूरत है । तो गुलजार ने कह दिया 2 दिन में आ जाएंगे । इस तरह गुलफाम कली में गुलजार से ₹3000 लेने का वचन ले लिया । लेकिन जैसे गुलजार घर पहुंचा तो उसे पता चला कि घर में तो ₹5000 है । उनमें से आधे गब्बर के पिता गुलाब के हैं । क्योंकि दोनों की खेती एक साथ होती थी । और खेती का अनाज भी दोनों भाई एक साथ बेचते थे । जो पैसे आते थे उनको गुलाब अपनी पत्नी के पास रख देते थे । दोनों भाइयों गुलाब और गुलजार में बहुत प्रेम था । दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे । और गुलजार भी गुलाब से फालतू में पैसे लेकर उन्हें खर्च नहीं करता था । अब गुलजार ने बहुत कोशिश की कि वह गुलाब से पैसे नहीं मांगे । लेकिन वह बेचारा अपनी बहन गुलफाम कली द्वारा कही हुई शादी कराने वाली बात के सपने में डूबा हुआ था । अचानक से दूसरे दिन गुलजार ने झाड़ू लगाते हुए अपने बड़े भाई गुलाब से यह कह दिया । कि तू हमेशा मेरा बुरा चाहता है । तूने अपनी साली मोहिनी का विवाह मेरे होते हुए किसी और से करवा दिया । मेरी वह बहन गुलफाम कली कितनी अच्छी है अब मेरा विवाह कराएगी । फिर देखना मैं भी तेरी तरह हो जाऊंगा । गुलाब ने कहा देख गुलजार मैंने बहुत कोशिश की थी कि तुम्हारी शादी मोहिनी से हो जाए । लेकिन सभी को पता था कि तुम्हें ब्लड कैंसर है । और तुम कभी भी मर सकते हो इसलिए मोहिनी ने तुम्हारे साथ विवाह करने से मना कर दिया था । मैं करता भी क्या ? इसी बात को लेकर दोनों में बहस हो गई ।  गुलजार कहने लगा कि पिछले महीने तेरा बच्चा बीमार हो गया था उसको मैं मुम्बई लेकर गया था । वहां पर मेने उसका इलाज कराया था जिसमें मेरे ₹500 खर्च हो गए थे । उसे कौन देगा ? गुलाब ने कहा मैं दूंगा और कौन देगा ? गुलजार बोला ला दे मुझे अभी पिछले महीने ₹5000 का हमारा अनाज बिचा था उसमें से ₹2500 मेरे हुए और ₹500 इलाज के ला मुझे अभी दे । इस प्रकार गुलाब ने ₹3000 अपनी पत्नी से लेकर चाचा गुलजार को दे दिए । गुलजार चाचा तुरंत ही उन रुपयों को लेकर बहन गुलफाम कली को दे आता है । इसी बीच गुलफाम कली के बड़े भाई गुलशन को यह सब बात की भनक लग जाती है कि हमारी बहन गुलफाम कली ने हमारे पिताजी और छोटे भाइयों गुलाब और गुलजार को बेवकूफ बनाकर बहुत से रुपए लूट लिए हैं । और उन्है बेवकूप बनाकर उनसे बहुत सा सोना खरीद लिया है । उस सोने का रुपया हमारे पिताजी यानी के गब्बर के दादा ने दिया है । वह घर भी तो मेरा है जिसमें मेरे पिताजी और दो छोटे भाई रहते हैं । तो वह उस सोने को बहन गुलफाम कली से लेने की योजना बनाने लगता है । लेकिन गुलफाम कली बहुत चतुर औरत थी । उसे बेवकूप बनाना इतना आसान नहीं था । गुलफाम कली ने अपने बड़े भाई गुलशन से सोना देने से स्पष्ट मना कर दिया था । लेकिन गुलशन भी कम दिमाग का नहीं था । तुरन्त ही वर चतुराई से दूसरी तुरब फेंकता हूं । अबकी बार गुलशन ने गुलफाम कली के आदमी अपने छोटे जीजाजी जुम्मन को अपनी बातों में फसाया । उसने जुम्मन से दोस्ती की और कहा जुम्मन जी आप तो जानते हैं की हमारे बेटे विक्रम की शादी तय हो चुकी है । हमारे पास सोने के जेवर खरीदने के लिए एक भी पैसा नहीं है । आप ऐसा कर दो कि मुझे अपने किसी दोस्त की दुकान से अपनी जमानत पर 80 हजार रुपए के जेवर बनवा दीजिए । में विक्रम की शादी के बाद सारे रुपये दे दूंगा ‌। जुम्मन ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया । तो गुलशन ने अपने बड़े उसी बेटे विक्रम को कहां कि विक्रम तेरी शादी है । तू जाकर अपनी बुआ जी गुलफाम कली से ₹80000 के जेवर बनवाने का निवेदन कर । शायद वह तैयार हो जाएं । विक्रम ने ऐसा ही किया । वह अपनी बुआ गुलफाम कली के पास जाता है । और उन्हें किसी भी प्रकार जेवर बनवाने के लिए मना लेता है । बुआ गुलफाम कली और फूफा जुम्मन विक्रम की मीठी मीठी बातों में आ जाते हैं । और 80 हजार का जेवर बनवाने को पास के ही एक सुनार की ज्वेलरी की दुकान पर विक्रम को ले जाते हैं । विक्रम बहुत अच्छे अच्छे गहने अपनी घरवाली के लिए उस दुकान से खरीद लेता है । गुलफाम कली और जुम्मन यह कहते हैं कि इन ज्वेलरी के रुपयों को हमारा विक्रम शादी के बाद में तुम्हें वापस कर देगा । इस प्रकार विक्रम वहां से अपनी शादी के गहने लेकर घर आ जाता है । यह सब देखकर गुलसन मन ही मन खुश हो जाता है । और ये सोचता है कि हमारा बेटा विक्रम तो बहुत ही होशियार निकला है । लुटेरी को लूट लाया है । विक्रम गुलशन से कहता है कि पापा गहनो के रूपये शादी के बाद धीरे धीरे चुका देना । फूपाजी जुम्मन और भूआ गुलफाम कली ने मुझसे कहा है । गुलशन ने कहा ठीक है चुका देंगे । इस तरह गुलशन ने अपनी लुटेरी बहन गुलफाम कली को एक बार लूट लिया । लेकिन इस बात का बहन गुलफाम कली को बिल्कुल भी पता नहीं चल पाता है ।      उधर जब से गुलजार ने गुलाब से अपने हिस्से के रुपए लिए तब से दोनो में थोड़ी-थोड़ी अनबन हो गई थी । लेकिन शीघ्र ही यह तब बड़ी जब एक दिन गुलजार ने गुलाब के दोस्त फारुख से विक्रम की शादी के लिए ₹1000 उधार लेकर आया था गुलाब ने गुलजार से कहा कि फारुख से ₹1000 क्यों लाया है ₹3000 कहां गए तेरे ? तो गुलजार ने कहा तू शांत रह तुझे क्या करना कहां गए वे मेरे ही तो थे ? गुलाब कुछ नहीं बोला लेकिन दोनों में अंदरूनी टीश बढ़ने लगी । अब विक्रम के विवाह की वह तारीख भी आ गई दो-तीन दिन पहले बहिन गुलफाम कली अपने बच्चों के साथ अपने दो छोटे भाई गुलाब और गुलजार के यहां आकर रहने लगी उनका पूरा खर्चा गुलाब और गुलजार बहुत खुश होकर उठाने लगे । विक्रम की शादी हो गई गुलफाम कली भी अपने घर चली गई एक दिन फिर गुलफाम कली अकेली आई और अपनी बड़े भाई गुलशन के घर जाकर बोली गुलशन भैया विक्रम की शादी हो चुकी है । उसके घरवाली भी बहुत अच्छी और भाग्यवान आई है । लेकिन अब तुमको ज्वेलर के 80 हजार रुपए वापस करने होंगे । गुलशन में स्पष्ट मना कर दिया मेरे पास अभी नहीं है । इस बात का गुलफाम कली के आदमी जुम्मन को पता चला तो तो उसने कहा मैंने पहले ही कहा था । गुलशन बहुत शातिर आदमी है । उसने सारे रुपए बराबर कर लिए अब तुम भुगतो मैं ड्यूटी जा रहा हूं ।      अब कुछ दिन तक गुलफाम कली ने लूटना बंद कर दिया था । क्योंकि गुलाब और गुलजार के घर धीरे धीरे गरीबी बढ़ रही थी । गुलाब और गुलजार दोनों एक दूसरे से जब से अलग हो गए थे । गुलजार की शादी नहीं हुई थी । वो बेचारा अलग खाना बनाता था । लेकिन वह अपने लुटेरी बहन गुलफाम कली को फिर भी अच्छा मानता था । क्योंकि उन्हें हकीकत मालूम नहीं थी । गुलजार और गुलाब ने अपने-अपने खेत अलग अलग कर लिए थे । गुलाब के खेत में जो फसल होती थी उससे अपने परिवार का खर्चा नहीं चला पा रहा था ।  गुलजार अपने खेत में उत्पन्न हुए अनाज को बेचकर सारे रुपयों को अपनी शादी के लिए वहन गुलफाम कली को देता जा रहा था । और अपने खाने लायक थोड़ा सा ही अनाज बचाता था । कभी-कभी सब्जी बना लेता था । तो कभी मिर्ची की चटनी और अचार से ही खाना खा लिया करता था । उसे अपने बड़े भाई गुलाब के परिवार पर तनिक भी दया नहीं आ रही थी । उसके सिर पर तो सिर्फ शादी का भूत सवार था । जिसे गुलफाम कली ने उसके सिर पर बेवकूफ बनाकर बिठा दिया था । इस तरह गुलजार लुटता जा रहा था । लेकिन उसे हकीकत पता नहीं थी । कुछ दिन बाद गुलजार ने एक आटे की चक्की लगाई । और उसमें उसे जो रुपए आते उनको गुलफाम कली के यहां जमा करता जाता था । लेकिन अपने नतीजों की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहा था । गुलाब सोचता कि गुलजार मेरा अच्छा भाई है । लेकिन वहां कह नहीं पा रहा था । गुलजार को देखकर गुलाब ने भी अपने बच्चों को पालने के लिए कोई धंधा करना उचित समझा । लेकिन उसके पास धंधे के लिए रुपए नहीं थे । तो ऐसी स्थिति में गुलाब की पत्नी ने गुलाब से कहा मेरा भाई एक अच्छे साहूकार के यहां नौकरी करता है । मैं उस साहूकार से ₹5000 उधार लेकर आती हूं । तुम कुछ धंधा शुरू कर देना । इसी बीच गुलाब की मुलाकात गांव के एक दमदार परिवार के आदमी बीरबल से होती है । बीरबल को लेकर गुलाब अपने घर आता है । बीरबल से अपने परिवार का वृतांत सुनाता है । जिसे सुनकर बीरबल को बहुत दुख होता है । और वह कहता है कि तुम एक काम करो अपने लिए 2 भैंस बांध लो । उसके दूध से आपका खर्चा चलता रहेगा । बीरबल गुलाब को लेकर एक भैंस बेचने वाले व्यापारी के पास जाता है । और उससे ₹5000 की भैंस खरीद कर बीरबल के घर ले आता है । गुलाब और उसके बच्चे बहुत खुश हो जाते हैं । बीरबल कहता है तुम चिंता मत करो मेरे चाचा के पास एक भैंस है । उनकी शादी नहीं हुई है वह चार दिनों बाद तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं । लेकिन उनकी भैंस अभी दूध नहीं दे रही है । उसे 1 महीने आपको वैसे ही चराना पड़ेगा । फिर वह बच्चा देगी और तुम्हारे पास दूध ही दूध हो जाएगा । मैं उसे भैंस को तुम्हें उधार दिलवा सकता हूं । पैसे तुम बाद में दे देना । गुलाब खुश हो जाता है । और उस भैंस को भी ₹8000 देने की कहकर अपने घर ले आता है । इसी बीच गुलाब की हालत सही खान-पान ना होने से बिगड़ जाती है । और वह टीवी की बीमारी का शिकार हो जाता है । गुलाब की पत्नी बीरबल को साथ लेकर उसे मुम्बई हॉस्पिटल में दिखाती है । कुछ दिन तक तो उसकी हालत खराब होती जाती है । और उसे कई डॉक्टरों को दिखाया जाता है । लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है । फिर संयोगवस ईश्वर की कृपा से गुलाब को एक डॉक्टर के दवा सूट कर जाती है । और वह ठीक होने लगता है । और उसके परिवार भी अच्छे से दो समय की दाल रोटी भी आसानी से जुटा लेता है । बच्चे भी खुशी खुशी रहते है । एक दिन गुलाब अपनी बहन गुलफाम कली से मिलने उनके घर जाता है । और यह कहता है कि मैं बड़ी मुश्किल से बचा हूं । गुलफाम कली गुलाब से कहती है कि दिल्ली में टीवी का बहुत बड़ा अस्पताल है । उसमें जाकर दिखाना । साथ ही साथ वह कहती है कि बीरबल बहुत बुरा आदमी है । उससे तुमने दोस्ती कर ली है । वह तुम्हारे घर में तुम्हारी पत्नी के वास्ते आता है । और उसने ही तुम्हारे घर में तुम दोनों भाइयों में आपस में लड़ाई करवा रखी है । गुलजार मुझे सारी बात बताता है । ऐसे आदमी को तुम्हें अपने घर में नहीं रखना चाहिए ।  गुलजार और तुम दोनों भाई प्रेम से रहो । गुलाब गुलफाम कली की बातों में आकर वहां से घर के लिए आता है । घर आकर कुछ नहीं बताता है । दूसरे दिन बीरबल गुलजार के घर चाय पीने और हालचाल पूछने आता है । बीरबल और गुलाब की पत्नी दोनों बैठ कर चाय पी रहे थे । गुलाब भैंस के लिए चारा लेकर शाम के समय घर आए थे । उनका स्वास्थ्य सही नहीं था । इसलिए वो घर आकर खटिया पर लेट गए । तभी अचानक लाइट चली गई । बीरबल और गुलाब की पत्नी मोमबत्ती देख रहे थे । इसी बीच गुलाब आया । अपनी घरवाली को गुलफाम कली के बताए अनुसार बीरबल के बारे में गलत धारणा रखकर खरी खोटी सुनाने लगा । गुलाब की पत्नी और बीरबल गलत नहीं थे । इसलिए गुलाब की पत्नी ने बीरबल से कहा कि मेरे आदमी से कुछ मत कहो । तुम अब चले जाओ और इस घर में कभी मत आना । बीरबल चुपचाप बिना कुछ कहे वहां से चला जाता है । अगले दिन सुबह ही गुलाब की पत्नी अपने दो छोटे बच्चों को लेकर मायके चली जाती है । गुलाब अपनी पत्नी से 'कहां जा रही हो' यह भी नही पूछता है । दूसरे दिन गुलाब को कुछ काम से बाजार जाना था । गुलाब को साइकिल चलाने का बहुत शौक था । उसे टैम्पो या बस से पैसे देकर थोडी दूरी का सफर करना पसंद नहीं था । उनके पास साइकिल तो थी लेकिन दोनों भाइयों के बंटवारे में वह साइकिल गुलजार के हिस्से में आ गई थी । गुलजार उसे गुलाब को चलाने के लिए खुद नहीं कहता था । गुलाब सोचने लगा कि कैसे में गुलजार से बाजार जाने के लिए साइकिल मांगू । क्या पता मना कर दे ? इसलिए गुलाब की गुलजार से साइकिल मांगने की हिम्मत नहीं हो रही थी । तो गुलाब ने अपने लड़के गब्बर को बुलाया । और कहा के तुम जाकर गुलजार चाचा से कहो कि पापा को बाजार जाने के लिए 2 घंटे को साइकिल दे दोगे क्या ? गब्बर तुरंत गुलजार चाचा के कमरे में जाता है । और और गुलजार चाचा से बोलता है कि चाचा, पापा को 2 घंटे के लिए साइकिल चाहिए । क्या आप दे सकते हैं ? तो गुलजार चाचा ने कहा मैंने कब मना किया है । लेकिन वो मुझसे मांगे तब ना । वह साइकिल रखी है और ले जाए और अपने यहां ही साइकिल को रख ले । मुझे जरूरत पड़ेगी मैं मांग लूंगा । गुलजार चाचा ने जैसा कहा वैसा ही गब्बर ने अपने पिता गुलाब से कह दिया । गुलाब तुरंत गुलजार के कमरे में गया । और साइकिल निकालते हुए बोला क्या कर रहा है ? तो गुलजार ने कहा खाना बनाने की तैयारी कर रहा हूं । गुलाब ने कहा सब्जी क्या बनाई है ? तो गुलजार ने कहा कि आज सब्जी नहीं बनाई चटनी बनाई है । और अचार खराब हो गया था इसलिए फेंक दिया । तो गुलाब ने कहा आम का अचार चाहिए तो मैं लाऊं । गुलजार ने कहा फिर तो मजा आ जाए । गुलाब ने अपने बेटे गब्बर से कहा कि डिब्बे में से एक कटोरी में आचार लेकर चाचा को दे आओ अभी । गब्बर ने कहा पापा मम्मी अचार में हाथ डालने से मना करती है । कहती है कि अचार खराब हो जाएगा । गुलाब ने कहा तुम्हारी मम्मी मामा के यहां गई हुई है उसे पता ही नहीं चलेगा । और तुम अपने लिए भी खाने निकाल लेना । गब्बर ने एक कटोरी में अचार निकाला और अपने पिता गुलाब को दे दिया । गुलाब अचार की कटोरी को लेकर बडे प्रेम से छोटे भाई गुलजार के यहां पहुंचा और उससे कहा यह ले अचार । दो-तीन दिन के लिए कर लेना । वो घर पर नहीं है इसलिए मैं ले आया हूं । गुलजार ने कहा ठीक है तू अब अपने काम से जा । हां और साइकिल को अच्छे से देख कर चलाना । क्योंकि तूने 2 साल से यह साइकिल चलाई नहीं है । गुलाब खुश होकर बाजार चला जाता है । और 3 घंटे मे खुशी खुशी बाजार से घर आ जाता है । घर आते ही वह तुरन्त साइकिल को गुलजार के यहां रखने के लिए कमरे में साइकिल लेकर पहुंच जाता है । उस समय गुलजार बत्ती वाले स्टोप पर चाय बना रहा होता है ‌। गुलाब कहता है यह रखी है साईकिल । मैं अब चलता हूं । तो गुलजार कहता है ऐसे क्यों कह रहा है । क्या साइकिल तेरी नहीं है ? अपने यहां रख लेता उस घर में जैसी इस घर में । गुलजार के मुख से ऐसे शब्दों को सुनकर गुलाब बहुत खुश हो जाता है । और दोनों में एक बार फिर दोस्ती का सिलसिला शुरू हो जाता है । गुलजार कहता है कि तेरा अचार बहुत अच्छा था । दो-तीन दिन को हो जाएगा मेरे लिए । मुझे तो तुझ पर विश्वास है । अब तू बता तेरे लिए गिलास में चाय छानूं या नहीं । क्योंकि तुझे तो मुझ पर विश्वास नहीं होगा । क्या पता मैं तुझे कुछ मिला कर दे दूं । तो गुलाब ने कहा ला अब तू मुझे चाय दे फालतू बात मत करें । इस तरह गुलाब और गुलजार दोनों भाई कमरे में बड़े प्रेम से बैठकर साथ में चाय पीते हैं । तभी गुलाब का लड़का गब्बर वहां आ जाता है । गब्बर को देखकर गुलजार अपने गिलास में से एक प्लेट में थोड़ी सी चाय लेते हैं । और गब्बर को दे देते हैं । गब्बर अपने पिता गुलाब की तरफ देखता है । तो गुलाब कहता है पीले कोई बात नहीं । गब्बर भी अपने चाचा के यहां चाय पी लेता है । अब कुछ देर बाद दोनों भाई गुलाब और गुलजार बाहर बैठकर आपस में बातें करते हैं । जिसे देख कर पड़ोस वाले लोग जलते हैं ।  लेकिन उन दोनो भाईयों को कोई फर्क नहीं पड़ता । कुछ दिन बाद गुलाब की पत्नी अपने घर वापस आ जाती है । और उसे भी पता चलता है कि दोनों भाइयों में अच्छी दोस्ती हो गई है । दोनों आपस में मिलकर चार-पांच दिन से खाना बना रहे थे । गुलाब की पत्नी को खुशी होती है लेकिन वो कुछ कह नहीं पाती है । गुलाब की पत्नी के घर आते ही गुलजार बिना कुछ कहे चुपचाप साइकिल से बाजार चला जाता है । और वहां से बहुत सा खाने पीने का सामान सब्जी और मसाले लेकर आता है । और गुलाब से कहता है इनको उधर अपने कमरे भाभी को दे आओ । गुलाब खुशी खुशी अपनी पत्नी और बच्चो के यहां उस समान के थैले को लेकर अपनी पत्नी के हाथ में देता है । एकदम से पत्नी चिल्लाकर कहती है । मुझे उस दुष्ट गुलजार का कोई भी सामान नहीं चाहिए । उसे वापस करके आओ । गुलाब बिना कुछ कहे सामान को अपने घर में ही रख कर बाहर चला जाता है । गुलाब के चले जाने के बाद उसके छोटे छोटे बच्चे अपनी मां से कहते है देखो मम्मी चाचा ने केले भेजे हैं । गुलाब की पत्नी ने अपने बच्चो से कहा चुपचाप रहना कोई सामान को हाथ नहीं लगाएगा । बरना हड्डी तोड़ कर फेंक दूंगी । मां के डर से कोई कुछ नहीं बोला । सभी चुपचाप अपने कमरे में बैठे रहे । शाम के समय जब गुलाब घर आया तो उसने देखा 





भारत में एक छोटे से गांव हमीरपुर में तीन भाई और एक बहन रहते थे । सबसे बड़े भाई का नाम गुलशन था । दूसरे नंबर के भाई का नाम गुलाब था । और तीसरे नंबर के भाई का नाम गुलजारी था । चौथे नंबर की बहन थी , जिसका नाम गुलफाम कली था । गुलशन के दो लडके और एक लड़की थी गुलाब के तीन लड़के और एक सबसे छोटी लड़की थी । तीसरा भाई गुलजारी था । उसके कोई संतान नहीं थी , क्योंकि उसकी शादी नहीं हुई थी । यह उपन्यास गुलाब के दूसरे नंबर के लड़के गब्बर ने प्रेषक बनकर अपना वृत्तांत सुनाया है । जब गब्बर का जन्म हुआ था तब उसके पिता गुलाब अपने बड़े घर को छोड़कर एक अलग से आकर झोपड़ी बनाकर रहने लगे थे । उनके साथ उनकी पत्नी कमला और उनके तीन बच्चे और एक सबसे छोटी बच्ची थी । उनके साथ ही गुलाब के पिताजी गब्बर के दादा भी रहते थे । वह एक सरकारी संस्था में थे । जो रिटायर हो चुके थे । उन्हें ₹5000 पेंशन के मिलते थे । बहन गुलफाम कली नहीं चाहती थी , कि गुलाब का परिवार अच्छा खाए पिए और खुशी से रहे ।
        गुलशन गुलाब और गुलजार की माताजी कामिनी थी । कामिनी के कोई भाई नहीं था । इसीलिए माता जी के माइके की सारी जमीन उनके पिताजी को मिली । जिस जमीन को गुलशन गुलाब और गुलजार की नानी के मरने के बाद जल्द ही उसे बेच दिया गया । और उसी जमीन के जो रुपए आए थे उन्हें तीन भाइयों गुलशन गुलाब और गुलजार मैं बराबर बराबर बांटने के लिए उनके पिताजी ने कहा । लेकिन तीनों भाइयों की लुटेरी बहन गुलफाम कली जिसकी शादी हो जाने के बाद भी उन पैसों से अपना हिस्सा लेना चाहती थी । इस बात को लेकर गुलाब और गुलजार को कोई आपत्ति नहीं थी ।  लेकिन सबसे बड़े भाई गुलशन को आपत्ति थी । गुलशन ने कहा कि सुन बहन गुलफाम कली हमने तेरी शादी कर दी है । अब तेरा यहां कुछ नहीं है । इसलिए नानी के जमीन के रुपया में तेरा कोई हक नहीं है । गुलफाम कली अपने बड़े भाई गुलशन से डरती थी । क्योंकि गुलशन की घरवाली बिल्कुल ही गवार औरत थी । उसे तो बोलने का भी तमीज नहीं था । हर किसी से गालियां देकर बात करती थी । इसलिए उससे सभी डरते थे । गुलशन की घरवाली के मना करने पर गुलफाम कली कुछ नहीं बोली । और चुपचाप बिना कुछ कहे अपने घर ससुराल चली गई । नानी के रूपयों को तीनों भाइयों गुलशन गुलाब और गुलजार ने बराबर बराबर बांट लिया था ।  इन रुपयों मैं गुलफाम कली को कुछ भी हाथ नहीं लग पाया । तो उसे बहुत बुरा लगा । वह इन रुपयों को अपने दो छोटे भाइयों गुलाब और गुलजार को बेवकूफ बनाकर लूटने की योजना बनाने लगी । जो अपनी इस योजना में आखिरकार सफल हो ही गई थी । वह 1 दिन अपने पिता और दोनो छोटे भाईयो गुलाब और गुलज़ार के घर आई । और घडियाली आंसू बहाते हुए बोली कि मुझको ससुराल वाले बहुत परेशान करते हैं । मुझसे यह कहते हैं के तू ससुराल से कुछ लेकर नहीं आई है । और मेरी जिठानी मुझे रोज रोज यह ताने देती है । जिससे मैं तंग आ गई हूं । और पिताजी आपसे मैं सोने के कानो के लिए झुमकी लेना चाहती हूं । क्योकि आपने मुझे शादी में नहीं दिए थे । तो पिताजी ने कहा गुलाब और गुलजार से पूछ ले । गब्बर के पिता गुलाब और चाचा गुलजार थे । गब्बर के पिता सीधे-साधे आदमी थे । और चाचा थोडे से चतुर थे । गब्बर की मां एक होशियार महिला थी । लेकिन उसकी गब्बर के चाचा पर से नहीं चलती थी । जब गब्बर की माता को इस बात का पता चला तो उसने गब्बर के पिता गुलाब को खूब समझाने की कोशिश की । लेकिन उस बिचारी औरत की बिल्कुल न चली । आखिरकार गब्बर के दादा ने कह दिया । कि कोई बात नहीं हमारी छोटी लडकी है और तुम्हारी छोटी बहन है ।  हम इसके लिए जो कुछ करेंगे वह सब पुन्य का काम होगा । इस प्रकार सभी गुलफाम कली की झूठी बातों में आ गए । और उन्हें कई बार सोने की चीज कभी अंगूठी कभी तोरिया कभी बाला बनवाते गए । लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था के गुलफाम कली एक लुटेरी बहन है । इसके बाद यह सिलसिला चलता रहा । फिर गुलशन के बड़े लड़के विक्रम का विवाह तय हुआ । गुलशन और गुलफाम काली दोनों एक जैसी प्रकृति के थे । वे दोनों ही गुलाब के परिवार की खुशी नहीं चाहते थे । जब गुलशन के बेटे विक्रम के विवाह के लिए सगाई हुई तो गुलफाम कली को बहुत अच्छा लगा । वह मन ही मन प्रसन्न होने लगी । लेकिन संयोगवश कुछ उल्टा हुआ । गुलाब के पिता गब्बर के दादा अचानक से हार्ट अटैक की बीमारी से इस दुनिया से चले गए । एकदम से पूरा परिवार मातम के गम में डूब गया । गब्बर के दादा अपने बड़े भाई गुलशन को चाहते नहीं थे । क्योंकि गुलशन की पत्नी हेमलता बहुत बेकार थी । वह गुलशन से अपने ससुर में रोज गालियां देती और दिलवाती थी । एक बार तो उसने अपने ससुर में अपने भाई शिवकुमार से कह कर जूते दिलवा दिए थे । ऐसे ही रोज-रोज के झंझट से परेशान होकर गब्बर के दादा अपने दो छोटे बच्चों के साथ उस घर को छोड़कर झोपड़ी नुमा एक छोटे से घर में रह रहे थे । अब गब्बर के दादा का दाह संस्कार करना था । इसके लिए गांव के लोगों ने गब्बर के चाचा गुलजारी को कहा ।  गुलजारी चाचा अपने पिता का दाह संस्कार करने के लिए चल दिया । उनका दाह संस्कार हो गया । अब दूसरे दिन गंगा जी के लिए भी गुलजारी चाचा चला गया । इसी बीच गुलशन ने कहा के मैं भी पिताजी के अंतिम संस्कार के कुछ रुपए देने आया हूं कि वे मेरे भी पिता थे । गब्बर के पिता गुलाब ने गुलशन की मीठी बातों पर विश्वास करके अंतिम संस्कार में और ब्राह्मण भोज में सम्मिलित कर लिया । ब्राह्मण भोज हो जाने के कुछ दिनों बाद गुलशन के बेटे विक्रम का विवाह तय हो गया । विवाह की तारीख धीरे धीरे नजदीक आयी । लेकिन अब बहन गुलफाम कली परेशान थी कि वह अब किस से पैसे लूटे क्योकि गब्बर के दादा के मरने के बाद गब्बर के पिता गुलाब और गब्बर के चाचा गुलजार एक साथ तो रहते थे । लेकिन अब उनके पास रोजी रोटी के अलावा ज्यादा रुपया किसी को देने के लिए नहीं था । क्योंकि पहले तो उनके पिताजी को ₹5000 पेंशन मिलती थी । जो मरने के बाद बंद हो चुकी थी । ऐसी परिस्थिति में लुटेरी बहन गुलफाम कली ने अपने भाइयों पर बिल्कुल भी रहम नहीं किया । और अपने भतीजे विक्रम के विवाह में शामिल होने के लिए अपने छोटे भाई गब्बर के चाचा गुलजार को बेवकूफ बनाने का प्लान बनाया । एक दिन गुलजार चाचा किसी काम से अपनी बहिन गुलफाम कली के यहां गए थे । तो गुलफाम कली चाचा गुलजार से कहती है । गुलजार भाई मैंने आपके लिए मुम्बई में एक लड़की देखी है । मैं उससे बात विक्रम के विवाह के बाद करूंगी । गुलजार चाचा खुश हो जाता है और अपनी बहन बनी डायन के झांसे में आ जाता है । बातों ही बातों में भूआ गुलफाम ने चाचा गुलजार से कह दिया कि मुझको 3000 रुपयों की जरूरत है । तो गुलजार ने कह दिया 2 दिन में आ जाएंगे । इस तरह गुलफाम कली में गुलजार से ₹3000 लेने का वचन ले लिया । लेकिन जैसे गुलजार घर पहुंचा तो उसे पता चला कि घर में तो ₹5000 है । उनमें से आधे गब्बर के पिता गुलाब के हैं । क्योंकि दोनों की खेती एक साथ होती थी । और खेती का अनाज भी दोनों भाई एक साथ बेचते थे । जो पैसे आते थे उनको गुलाब अपनी पत्नी के पास रख देते थे । दोनों भाइयों गुलाब और गुलजार में बहुत प्रेम था । दोनों एक दूसरे के बिना रह नहीं सकते थे । और गुलजार भी गुलाब से फालतू में पैसे लेकर उन्हें खर्च नहीं करता था । अब गुलजार ने बहुत कोशिश की कि वह गुलाब से पैसे नहीं मांगे । लेकिन वह बेचारा अपनी बहन गुलफाम कली द्वारा कही हुई शादी कराने वाली बात के सपने में डूबा हुआ था । अचानक से दूसरे दिन गुलजार ने झाड़ू लगाते हुए अपने बड़े भाई गुलाब से यह कह दिया । कि तू हमेशा मेरा बुरा चाहता है । तूने अपनी साली मोहिनी का विवाह मेरे होते हुए किसी और से करवा दिया । मेरी वह बहन गुलफाम कली कितनी अच्छी है अब मेरा विवाह कराएगी । फिर देखना मैं भी तेरी तरह हो जाऊंगा । गुलाब ने कहा देख गुलजार मैंने बहुत कोशिश की थी कि तुम्हारी शादी मोहिनी से हो जाए । लेकिन सभी को पता था कि तुम्हें ब्लड कैंसर है । और तुम कभी भी मर सकते हो इसलिए मोहिनी ने तुम्हारे साथ विवाह करने से मना कर दिया था । मैं करता भी क्या ? इसी बात को लेकर दोनों में बहस हो गई ।  गुलजार कहने लगा कि पिछले महीने तेरा बच्चा बीमार हो गया था उसको मैं मुम्बई लेकर गया था । वहां पर मेने उसका इलाज कराया था जिसमें मेरे ₹500 खर्च हो गए थे । उसे कौन देगा ? गुलाब ने कहा मैं दूंगा और कौन देगा ? गुलजार बोला ला दे मुझे अभी पिछले महीने ₹5000 का हमारा अनाज बिचा था उसमें से ₹2500 मेरे हुए और ₹500 इलाज के ला मुझे अभी दे । इस प्रकार गुलाब ने ₹3000 अपनी पत्नी से लेकर चाचा गुलजार को दे दिए । गुलजार चाचा तुरंत ही उन रुपयों को लेकर बहन गुलफाम कली को दे आता है । इसी बीच गुलफाम कली के बड़े भाई गुलशन को यह सब बात की भनक लग जाती है कि हमारी बहन गुलफाम कली ने हमारे पिताजी और छोटे भाइयों गुलाब और गुलजार को बेवकूफ बनाकर बहुत से रुपए लूट लिए हैं । और उन्है बेवकूप बनाकर उनसे बहुत सा सोना खरीद लिया है । उस सोने का रुपया हमारे पिताजी यानी के गब्बर के दादा ने दिया है । वह घर भी तो मेरा है जिसमें मेरे पिताजी और दो छोटे भाई रहते हैं । तो वह उस सोने को बहन गुलफाम कली से लेने की योजना बनाने लगता है । लेकिन गुलफाम कली बहुत चतुर औरत थी । उसे बेवकूप बनाना इतना आसान नहीं था । गुलफाम कली ने अपने बड़े भाई गुलशन से सोना देने से स्पष्ट मना कर दिया था । लेकिन गुलशन भी कम दिमाग का नहीं था । तुरन्त ही वर चतुराई से दूसरी तुरब फेंकता हूं । अबकी बार गुलशन ने गुलफाम कली के आदमी अपने छोटे जीजाजी जुम्मन को अपनी बातों में फसाया । उसने जुम्मन से दोस्ती की और कहा जुम्मन जी आप तो जानते हैं की हमारे बेटे विक्रम की शादी तय हो चुकी है । हमारे पास सोने के जेवर खरीदने के लिए एक भी पैसा नहीं है । आप ऐसा कर दो कि मुझे अपने किसी दोस्त की दुकान से अपनी जमानत पर 80 हजार रुपए के जेवर बनवा दीजिए । में विक्रम की शादी के बाद सारे रुपये दे दूंगा ‌। जुम्मन ने इस बात का कोई जवाब नहीं दिया । तो गुलशन ने अपने बड़े उसी बेटे विक्रम को कहां कि विक्रम तेरी शादी है । तू जाकर अपनी बुआ जी गुलफाम कली से ₹80000 के जेवर बनवाने का निवेदन कर । शायद वह तैयार हो जाएं । विक्रम ने ऐसा ही किया । वह अपनी बुआ गुलफाम कली के पास जाता है । और उन्हें किसी भी प्रकार जेवर बनवाने के लिए मना लेता है । बुआ गुलफाम कली और फूफा जुम्मन विक्रम की मीठी मीठी बातों में आ जाते हैं । और 80 हजार का जेवर बनवाने को पास के ही एक सुनार की ज्वेलरी की दुकान पर विक्रम को ले जाते हैं । विक्रम बहुत अच्छे अच्छे गहने अपनी घरवाली के लिए उस दुकान से खरीद लेता है । गुलफाम कली और जुम्मन यह कहते हैं कि इन ज्वेलरी के रुपयों को हमारा विक्रम शादी के बाद में तुम्हें वापस कर देगा । इस प्रकार विक्रम वहां से अपनी शादी के गहने लेकर घर आ जाता है । यह सब देखकर गुलसन मन ही मन खुश हो जाता है । और ये सोचता है कि हमारा बेटा विक्रम तो बहुत ही होशियार निकला है । लुटेरी को लूट लाया है । विक्रम गुलशन से कहता है कि पापा गहनो के रूपये शादी के बाद धीरे धीरे चुका देना । फूपाजी जुम्मन और भूआ गुलफाम कली ने मुझसे कहा है । गुलशन ने कहा ठीक है चुका देंगे । इस तरह गुलशन ने अपनी लुटेरी बहन गुलफाम कली को एक बार लूट लिया । लेकिन इस बात का बहन गुलफाम कली को बिल्कुल भी पता नहीं चल पाता है ।      उधर जब से गुलजार ने गुलाब से अपने हिस्से के रुपए लिए तब से दोनो में थोड़ी-थोड़ी अनबन हो गई थी । लेकिन शीघ्र ही यह तब बड़ी जब एक दिन गुलजार ने गुलाब के दोस्त फारुख से विक्रम की शादी के लिए ₹1000 उधार लेकर आया था गुलाब ने गुलजार से कहा कि फारुख से ₹1000 क्यों लाया है ₹3000 कहां गए तेरे ? तो गुलजार ने कहा तू शांत रह तुझे क्या करना कहां गए वे मेरे ही तो थे ? गुलाब कुछ नहीं बोला लेकिन दोनों में अंदरूनी टीश बढ़ने लगी । अब विक्रम के विवाह की वह तारीख भी आ गई दो-तीन दिन पहले बहिन गुलफाम कली अपने बच्चों के साथ अपने दो छोटे भाई गुलाब और गुलजार के यहां आकर रहने लगी उनका पूरा खर्चा गुलाब और गुलजार बहुत खुश होकर उठाने लगे । विक्रम की शादी हो गई गुलफाम कली भी अपने घर चली गई एक दिन फिर गुलफाम कली अकेली आई और अपनी बड़े भाई गुलशन के घर जाकर बोली गुलशन भैया विक्रम की शादी हो चुकी है । उसके घरवाली भी बहुत अच्छी और भाग्यवान आई है । लेकिन अब तुमको ज्वेलर के 80 हजार रुपए वापस करने होंगे । गुलशन में स्पष्ट मना कर दिया मेरे पास अभी नहीं है । इस बात का गुलफाम कली के आदमी जुम्मन को पता चला तो तो उसने कहा मैंने पहले ही कहा था । गुलशन बहुत शातिर आदमी है । उसने सारे रुपए बराबर कर लिए अब तुम भुगतो मैं ड्यूटी जा रहा हूं ।      अब कुछ दिन तक गुलफाम कली ने लूटना बंद कर दिया था । क्योंकि गुलाब और गुलजार के घर धीरे धीरे गरीबी बढ़ रही थी । गुलाब और गुलजार दोनों एक दूसरे से जब से अलग हो गए थे । गुलजार की शादी नहीं हुई थी । वो बेचारा अलग खाना बनाता था । लेकिन वह अपने लुटेरी बहन गुलफाम कली को फिर भी अच्छा मानता था । क्योंकि उन्हें हकीकत मालूम नहीं थी । गुलजार और गुलाब ने अपने-अपने खेत अलग अलग कर लिए थे । गुलाब के खेत में जो फसल होती थी उससे अपने परिवार का खर्चा नहीं चला पा रहा था ।  गुलजार अपने खेत में उत्पन्न हुए अनाज को बेचकर सारे रुपयों को अपनी शादी के लिए वहन गुलफाम कली को देता जा रहा था । और अपने खाने लायक थोड़ा सा ही अनाज बचाता था । कभी-कभी सब्जी बना लेता था । तो कभी मिर्ची की चटनी और अचार से ही खाना खा लिया करता था । उसे अपने बड़े भाई गुलाब के परिवार पर तनिक भी दया नहीं आ रही थी । उसके सिर पर तो सिर्फ शादी का भूत सवार था । जिसे गुलफाम कली ने उसके सिर पर बेवकूफ बनाकर बिठा दिया था । इस तरह गुलजार लुटता जा रहा था । लेकिन उसे हकीकत पता नहीं थी । कुछ दिन बाद गुलजार ने एक आटे की चक्की लगाई । और उसमें उसे जो रुपए आते उनको गुलफाम कली के यहां जमा करता जाता था । लेकिन अपने नतीजों की तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रहा था । गुलाब सोचता कि गुलजार मेरा अच्छा भाई है । लेकिन वहां कह नहीं पा रहा था । गुलजार को देखकर गुलाब ने भी अपने बच्चों को पालने के लिए कोई धंधा करना उचित समझा । लेकिन उसके पास धंधे के लिए रुपए नहीं थे । तो ऐसी स्थिति में गुलाब की पत्नी ने गुलाब से कहा मेरा भाई एक अच्छे साहूकार के यहां नौकरी करता है । मैं उस साहूकार से ₹5000 उधार लेकर आती हूं । तुम कुछ धंधा शुरू कर देना । इसी बीच गुलाब की मुलाकात गांव के एक दमदार परिवार के आदमी बीरबल से होती है । बीरबल को लेकर गुलाब अपने घर आता है । बीरबल से अपने परिवार का वृतांत सुनाता है । जिसे सुनकर बीरबल को बहुत दुख होता है । और वह कहता है कि तुम एक काम करो अपने लिए 2 भैंस बांध लो । उसके दूध से आपका खर्चा चलता रहेगा । बीरबल गुलाब को लेकर एक भैंस बेचने वाले व्यापारी के पास जाता है । और उससे ₹5000 की भैंस खरीद कर बीरबल के घर ले आता है । गुलाब और उसके बच्चे बहुत खुश हो जाते हैं । बीरबल कहता है तुम चिंता मत करो मेरे चाचा के पास एक भैंस है । उनकी शादी नहीं हुई है वह चार दिनों बाद तीर्थ यात्रा पर जा रहे हैं । लेकिन उनकी भैंस अभी दूध नहीं दे रही है । उसे 1 महीने आपको वैसे ही चराना पड़ेगा । फिर वह बच्चा देगी और तुम्हारे पास दूध ही दूध हो जाएगा । मैं उसे भैंस को तुम्हें उधार दिलवा सकता हूं । पैसे तुम बाद में दे देना । गुलाब खुश हो जाता है । और उस भैंस को भी ₹8000 देने की कहकर अपने घर ले आता है । इसी बीच गुलाब की हालत सही खान-पान ना होने से बिगड़ जाती है । और वह टीवी की बीमारी का शिकार हो जाता है । गुलाब की पत्नी बीरबल को साथ लेकर उसे मुम्बई हॉस्पिटल में दिखाती है । कुछ दिन तक तो उसकी हालत खराब होती जाती है । और उसे कई डॉक्टरों को दिखाया जाता है । लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है । फिर संयोगवस ईश्वर की कृपा से गुलाब को एक डॉक्टर के दवा सूट कर जाती है । और वह ठीक होने लगता है । और उसके परिवार भी अच्छे से दो समय की दाल रोटी भी आसानी से जुटा लेता है । बच्चे भी खुशी खुशी रहते है । एक दिन गुलाब अपनी बहन गुलफाम कली से मिलने उनके घर जाता है । और यह कहता है कि मैं बड़ी मुश्किल से बचा हूं । गुलफाम कली गुलाब से कहती है कि दिल्ली में टीवी का बहुत बड़ा अस्पताल है । उसमें जाकर दिखाना । साथ ही साथ वह कहती है कि बीरबल बहुत बुरा आदमी है । उससे तुमने दोस्ती कर ली है । वह तुम्हारे घर में तुम्हारी पत्नी के वास्ते आता है । और उसने ही तुम्हारे घर में तुम दोनों भाइयों में आपस में लड़ाई करवा रखी है । गुलजार मुझे सारी बात बताता है । ऐसे आदमी को तुम्हें अपने घर में नहीं रखना चाहिए ।  गुलजार और तुम दोनों भाई प्रेम से रहो । गुलाब गुलफाम कली की बातों में आकर वहां से घर के लिए आता है । घर आकर कुछ नहीं बताता है । दूसरे दिन बीरबल गुलजार के घर चाय पीने और हालचाल पूछने आता है । बीरबल और गुलाब की पत्नी दोनों बैठ कर चाय पी रहे थे । गुलाब भैंस के लिए चारा लेकर शाम के समय घर आए थे । उनका स्वास्थ्य सही नहीं था । इसलिए वो घर आकर खटिया पर लेट गए । तभी अचानक लाइट चली गई । बीरबल और गुलाब की पत्नी मोमबत्ती देख रहे थे । इसी बीच गुलाब आया । अपनी घरवाली को गुलफाम कली के बताए अनुसार बीरबल के बारे में गलत धारणा रखकर खरी खोटी सुनाने लगा । गुलाब की पत्नी और बीरबल गलत नहीं थे । इसलिए गुलाब की पत्नी ने बीरबल से कहा कि मेरे आदमी से कुछ मत कहो । तुम अब चले जाओ और इस घर में कभी मत आना । बीरबल चुपचाप बिना कुछ कहे वहां से चला जाता है । अगले दिन सुबह ही गुलाब की पत्नी अपने दो छोटे बच्चों को लेकर मायके चली जाती है । गुलाब अपनी पत्नी से 'कहां जा रही हो' यह भी नही पूछता है । दूसरे दिन गुलाब को कुछ काम से बाजार जाना था । गुलाब को साइकिल चलाने का बहुत शौक था । उसे टैम्पो या बस से पैसे देकर थोडी दूरी का सफर करना पसंद नहीं था । उनके पास साइकिल तो थी लेकिन दोनों भाइयों के बंटवारे में वह साइकिल गुलजार के हिस्से में आ गई थी । गुलजार उसे गुलाब को चलाने के लिए खुद नहीं कहता था । गुलाब सोचने लगा कि कैसे में गुलजार से बाजार जाने के लिए साइकिल मांगू । क्या पता मना कर दे ? इसलिए गुलाब की गुलजार से साइकिल मांगने की हिम्मत नहीं हो रही थी । तो गुलाब ने अपने लड़के गब्बर को बुलाया । और कहा के तुम जाकर गुलजार चाचा से कहो कि पापा को बाजार जाने के लिए 2 घंटे को साइकिल दे दोगे क्या ? गब्बर तुरंत गुलजार चाचा के कमरे में जाता है । और और गुलजार चाचा से बोलता है कि चाचा, पापा को 2 घंटे के लिए साइकिल चाहिए । क्या आप दे सकते हैं ? तो गुलजार चाचा ने कहा मैंने कब मना किया है । लेकिन वो मुझसे मांगे तब ना । वह साइकिल रखी है और ले जाए और अपने यहां ही साइकिल को रख ले । मुझे जरूरत पड़ेगी मैं मांग लूंगा । गुलजार चाचा ने जैसा कहा वैसा ही गब्बर ने अपने पिता गुलाब से कह दिया । गुलाब तुरंत गुलजार के कमरे में गया । और साइकिल निकालते हुए बोला क्या कर रहा है ? तो गुलजार ने कहा खाना बनाने की तैयारी कर रहा हूं । गुलाब ने कहा सब्जी क्या बनाई है ? तो गुलजार ने कहा कि आज सब्जी नहीं बनाई चटनी बनाई है । और अचार खराब हो गया था इसलिए फेंक दिया । तो गुलाब ने कहा आम का अचार चाहिए तो मैं लाऊं । गुलजार ने कहा फिर तो मजा आ जाए । गुलाब ने अपने बेटे गब्बर से कहा कि डिब्बे में से एक कटोरी में आचार लेकर चाचा को दे आओ अभी । गब्बर ने कहा पापा मम्मी अचार में हाथ डालने से मना करती है । कहती है कि अचार खराब हो जाएगा । गुलाब ने कहा तुम्हारी मम्मी मामा के यहां गई हुई है उसे पता ही नहीं चलेगा । और तुम अपने लिए भी खाने निकाल लेना । गब्बर ने एक कटोरी में अचार निकाला और अपने पिता गुलाब को दे दिया । गुलाब अचार की कटोरी को लेकर बडे प्रेम से छोटे भाई गुलजार के यहां पहुंचा और उससे कहा यह ले अचार । दो-तीन दिन के लिए कर लेना । वो घर पर नहीं है इसलिए मैं ले आया हूं । गुलजार ने कहा ठीक है तू अब अपने काम से जा । हां और साइकिल को अच्छे से देख कर चलाना । क्योंकि तूने 2 साल से यह साइकिल चलाई नहीं है । गुलाब खुश होकर बाजार चला जाता है । और 3 घंटे मे खुशी खुशी बाजार से घर आ जाता है । घर आते ही वह तुरन्त साइकिल को गुलजार के यहां रखने के लिए कमरे में साइकिल लेकर पहुंच जाता है । उस समय गुलजार बत्ती वाले स्टोप पर चाय बना रहा होता है ‌। गुलाब कहता है यह रखी है साईकिल । मैं अब चलता हूं । तो गुलजार कहता है ऐसे क्यों कह रहा है । क्या साइकिल तेरी नहीं है ? अपने यहां रख लेता उस घर में जैसी इस घर में । गुलजार के मुख से ऐसे शब्दों को सुनकर गुलाब बहुत खुश हो जाता है । और दोनों में एक बार फिर दोस्ती का सिलसिला शुरू हो जाता है । गुलजार कहता है कि तेरा अचार बहुत अच्छा था । दो-तीन दिन को हो जाएगा मेरे लिए । मुझे तो तुझ पर विश्वास है । अब तू बता तेरे लिए गिलास में चाय छानूं या नहीं । क्योंकि तुझे तो मुझ पर विश्वास नहीं होगा । क्या पता मैं तुझे कुछ मिला कर दे दूं । तो गुलाब ने कहा ला अब तू मुझे चाय दे फालतू बात मत करें । इस तरह गुलाब और गुलजार दोनों भाई कमरे में बड़े प्रेम से बैठकर साथ में चाय पीते हैं । तभी गुलाब का लड़का गब्बर वहां आ जाता है । गब्बर को देखकर गुलजार अपने गिलास में से एक प्लेट में थोड़ी सी चाय लेते हैं । और गब्बर को दे देते हैं । गब्बर अपने पिता गुलाब की तरफ देखता है । तो गुलाब कहता है पीले कोई बात नहीं । गब्बर भी अपने चाचा के यहां चाय पी लेता है । अब कुछ देर बाद दोनों भाई गुलाब और गुलजार बाहर बैठकर आपस में बातें करते हैं । जिसे देख कर पड़ोस वाले लोग जलते हैं ।  लेकिन उन दोनो भाईयों को कोई फर्क नहीं पड़ता । कुछ दिन बाद गुलाब की पत्नी अपने घर वापस आ जाती है । और उसे भी पता चलता है कि दोनों भाइयों में अच्छी दोस्ती हो गई है । दोनों आपस में मिलकर चार-पांच दिन से खाना बना रहे थे । गुलाब की पत्नी को खुशी होती है लेकिन वो कुछ कह नहीं पाती है । गुलाब की पत्नी के घर आते ही गुलजार बिना कुछ कहे चुपचाप साइकिल से बाजार चला जाता है । और वहां से बहुत सा खाने पीने का सामान सब्जी और मसाले लेकर आता है । और गुलाब से कहता है इनको उधर अपने कमरे भाभी को दे आओ । गुलाब खुशी खुशी अपनी पत्नी और बच्चो के यहां उस समान के थैले को लेकर अपनी पत्नी के हाथ में देता है । एकदम से पत्नी चिल्लाकर कहती है । मुझे उस दुष्ट गुलजार का कोई भी सामान नहीं चाहिए । उसे वापस करके आओ । गुलाब बिना कुछ कहे सामान को अपने घर में ही रख कर बाहर चला जाता है । गुलाब के चले जाने के बाद उसके छोटे छोटे बच्चे अपनी मां से कहते है देखो मम्मी चाचा ने केले भेजे हैं । गुलाब की पत्नी ने अपने बच्चो से कहा चुपचाप रहना कोई सामान को हाथ नहीं लगाएगा । बरना हड्डी तोड़ कर फेंक दूंगी । मां के डर से कोई कुछ नहीं बोला । सभी चुपचाप अपने कमरे में बैठे रहे । शाम के समय जब गुलाब घर आया तो उसने देखा कि थैला जैसा था वैसा ही रखा है । किसी ने भी थैले से हाथ नहीं लगाया था । गुलाब ने अपने पुत्रो को आवाज देकर कहा गब्बर, राजेस, राजीव लो केले खा लो सभी ने अपनी मां की तरफ देखा तो मां की आंखें गुस्से से लाल थी । किसी ने अपने पिता गुलाब से केले लेने की हिम्मत नहीं की थी । पूरे सामान और केलो को लेकर गुलाब गुलशन के यहां चला गया और और थैला रख दिया । और गुलजार चाचा को सारी बात बता दी । गुलजार ने कहा तू एक काम कर कल अपनी बहन गुलफाम कली के यहां जाकर पूछ कि अब मुझे क्या करना चाहिए । वह बहुत अच्छी है और अपना हमेशा भला चाहती है । गुलाब दूसरे ही दिन बहन गुलफाम कली के यहां जाता है । और उसे आपने परिवार का किस्सा सुनाता है । जिसे सुनकर लुटेरी गुलफाम कली मन ही मन बहुत खुश होती है । यह कहती है गुलाब भाईसाहब जितना हो सके उसे परेशान कर । बच्चों को परेशान कर । तभी उसके होस ठिकाने आऐंगे । गुलाब ने अपनी बहिन गुलफाम कली के कहे अनुसार वैसा ही किया । वह अपनी पत्नी से रोज-रोज झगड़ा करने लगा । झगड़े से तंग आकर एक दिन गुलाब की पत्नी ने सुबह 8 बजे के समय अपने चारों बच्चों को कुऐ के पास ले जाकर कहां । सभी एक एक से इस कुएं में कूद जाते हैं । गुलाब की पत्नी ने सबसे बड़े बेटे राजेश से सबसे पहले कुए में कूदने के लिए कहा । लेकिन राजेश ने मना कर दिया । अब गब्बर का नंबर था । गब्बर से मां ने कूऐं में कूदने के लिए कहा गब्बर पहले तुम कूद आओ । तो गब्बर ने कहा मां मेरा नंबर तो राजेश के बाद में आएगा । क्योंकि वह मुझसे बड़ा है । राजेश ने कहा में नही पहले ये कूदेगा । तभी अचानक से गुलजार चाचा मटका लेकर कुऐं पर पानी भरने आते है । गुलाब की पत्नी सभी बच्चों को वहां से लेकर अंदर चली जाती है । और वह समझ आती है कि बच्चों को मौत से डर लग रहा है । इन्हें धोखे से मौत के हवाले करना पड़ेगा । नहीं तो मेरे मरने के बाद इनको इनके पापा गुलाब , चाचा गुलजार और भूआ गुलफाम कली परेशान करेंगे । और बेचारे रोएंगे तथा मुझे याद करेंगे । इसलिए गुलाब की पत्नी ने अपने मरने से पहले अपने बच्चो का मरना उचित समझा था । लेकिन मरना इतना सरल नहीं था । अगले दिन गुलाब की पत्नी अपने बच्चों को लेकर अपने मायके में चली जाती है । मायके में गब्बर के छोटे भाई राजीव को मामा अपने यहां रखने के लिए अपनी बडी बहन से कहते हैं ।  दीदी राजीव को हमारे यहां छोड़ दो । हम इसको अच्छे स्कूल में भर्ती करा देंगे । और अच्छे से रखेंगे । राजीव की मां ने कहा मुझे कोई आपत्ति नहीं है । खुशी से राख लो । तीन-चार दिन बाद गुलाब की पत्नी राजेश को अपने माइके में छोडकर अपने ससुराल आने की तैयारी करती है । मामा के पड़ोस में ही सोने चांदी को गलाने वाले बंगलोर के सुनार रहते थे । इनकी मामा से अच्छी दोस्ती थी । एक दिन गुलाब की पत्नी ने देखा कि पड़ोस में रहने वाला सुनार बाहर से तेजाब के बड़े-बड़े ड्रम मगाते है । और उनमें पूरे बाजार के सुनार तेजाब लेने आते थे । गुलाब की पत्नी ने तेजाब के बारे में सुना तो था । पर देखा नहीं था । तो एक दिन उसने सुनार से कहा भैया तेजाब कैसा होता है मुझे बताओ मेने देखा नही है । तो सुनार ने कहा तुम घर पर जाकर अपनी भाभी से देख लो । यहां में अभी काम कर रहा हूं । घर पर बहुत रखा है । गुलाब की पत्नी सुनार की घरवाली के पास उसके घर जाती है । और उससे तेजाब के बारे में पूछती हहै । सुनार की घरवाली बताती है यह देखो तेजाब यह बहुत खतरनाक होता है । यह हमारे शरीर को जलाकर सफेद कर देता है । इससे दूर रहना चाहिए । गब्बर की मां ने कहा भाभी यह बताओ इससे फायदा क्या है । वह बोली हमारे पतिदेव इसे सोना चांदी गलाने में प्रयोग करते हैं । यह कितना भी गंदा बर्तन हो उसे चुटकियों में चमका देता है । गुलाब की पत्नी ने कहा कैसे ? तो सुनार की घरवाली ने एक गंदा डिब्बा लिया जिसके तले में गंदगी जमी थी । उसमें तेजाब को डाला । कुछ ही देर में तेजाब की गर्मी से उसमें सावन जैसे झाग उत्पन्न होने लगे । जब झाग शांत हो गए फिर उसने तेजाब को एक गड्ढे में डाल दिया । और उस डिब्बे को दिखाया वह एकदम चमक रहा था । उसकी तली में काफी गंदगी लगी थी । वह पता नहीं कहां चली गई । गुलाब की पत्नी ने कहा भाभी जी हमारे घर में कई सारे बर्तन है । उनमें ऐसी गंदगी लगी है । वह छूटती ही नहीं है । तो सुनार की पत्नी ने कहा है तुम एक काम करो । जब तुम घर जाओ उस दिन मुझे बता देना । मैं तुम्हें एक बोतल तेजाब फ्री में दे दूंगी । गुलाब की पत्नी ने कहा फ्री में क्यों मैं पैसे दे दूंगी में ? तो सुनार की पत्नी ने कहा तुम्हारे भैया तुमसे पैसे लेंगे ही नहीं क्योंकि वह तुम्हें बहन मानते हैं । गुलाब की पत्नी ने कहा ठीक है मैं कल घर जाऊंगी । कल तुम मुझे एक बोतल तेजाब भर देना । अगले दिन सुनार की पत्नी ने एक बोतल तेजाब अपने पति से पूछ कर अलग रख दिया । अगले दिन गुलाब की पत्नी राजीव को मामा के यहां छोड़ कर अपने दो बच्चों और एक बच्ची को लेकर ससुराल के लिए जाने लगी । सभी लोग उनके पैर छूकर उन्हें जल्दी वापस आने के लिए कहने लगे । सुनार की पत्नी ने पैर छुए और 10 रूपये के साथ वह तेजाब की बोतल गुलाब की पत्नी को दे दी । और बोली ननद जी आपकी बहुत याद आएगी । फिर जल्दी घूम जाना । गुलाब की पत्नी ने कहा अभी मैं गई ही नही और तू कह रही है जल्दी आ जाना । मै आ जाऊंगी ठीक है । अपने बच्चो का और मेरे भैया का ख्याल रखना । सुनार की पत्नी ने कहा ठीक है ननद जी । गुलाब की पत्नी बच्चों को लेकर बस स्टैंड पर पहुंची तो वहां एक बस खड़ी थी । उसने कहा क्यों कहां जाना है । तो गुलाब की पत्नी ने कहा हमीरपुर जाना है । हमीरपुर वहां से 4 किलोमीटर दूर था । तो उसने कहा ₹5 लगेंगे हमीरपुर के जबकि उस समय ₹2 किराया था । तो गुलाब की पत्नी ने कहा ₹3 ले लेना । लेकिन बस वाला नहीं माना । तो गुलाब की पत्नी थोड़ी आगे पहुंची वहां पर उसे एक टेंपो दिखा । जो गांव की तरफ जा रहा था । गुलाब की पत्नी ने टेंपो को रुकने का इशारा किया । टेंपो वाले ने कहा कहां जाना है ? गुलाब की पत्नी ने कहा भैया हमें हमीरपुर जाना है । टेंपो वाले ने कहा 3 रुपए लगेंगे । गुलाब की पत्नी बच्चों को लेकर टेंपो में बैठ गई । कुछ ही देर में ससुराल आ गया । ससुराल पहुंचते ही अपने कमरे का ताला खोला । सभी बच्चे अपनी मां के साथ अंदर पहुंच गए । बच्चों के पिता गुलाब सामने खड़े होकर खुश होकर देख रहे थे ।  मेरे बच्चे मुझसे पापा कहेंगे । लेकिन मां के डर से किसी ने पिता की तरफ देखा तक नहीं । कुछ ही देर में पता चला कि घर पर आटा नहीं है । अब रोटी कैसे बनेगी । इसी सोच में शाम हो गई थी । उस समय रक्षाबंधन व्यतीत हुआ था । तो आते समय मामा के पड़ोस वालों ने अपने अपने घर से कुछ मिठाइयां गुलाब की पत्नी को दे बांध दिए थे । उनमें से गुलाब की पत्नी ने शाम के समय थोड़ी थोड़ी मिठाई बच्चों को खिलाई और थोड़ी सी खुद ने खाई । इस तरह एक रात बीत गई । अब अगली सुबह जब उठे तो मां ने बड़े लड़के राजेश को दूध लाने के लिए ₹3 दिए । जिनको लेकर बड़ा भाई गांव से 250 ग्राम दूध ले आया । गुलाब की पत्नी ने उस दूध में से थोड़ा सा लिया । और सभी के लिए थोड़ी-थोड़ी चाय बनाई । चाय पी कर सभी बच्चे खेलने लगे । लेकिन दोपहर में जब भूख लगी तो सभी मां के पास आकर बोले । मां ने मायके से लाई मिठाई में से सभी बच्चों को बराबर बराबर दे दी । इस तरह 3 दिन व्यतीत हो गए । तीसरे दिन दूध भी खत्म हो गया था । सुबह ही मां ने बड़े बेटे राजेश को ₹3 देकर दूध लाने को कहा । राजेश दूध ले आया । सभी के लिए चाय बनाई गई । लेकिन आज सारी मिठाई खत्म हो चुकी थी । इस समय तभी परेशान थे । धीरे धीरे दोपहर हुई । सभी बच्चो को भूख सताने लगी । सभी अपनी मां के पास आकर कहने लगे । मां ने कहां आज खाने को कुछ नहीं बचा है । यह चटाई लो और आराम से सो जाओ । भूख लगे तो कलश मैं पानी रखा है । उसको पी लेना । सभी भूख के मारे सो गए । पता ही नहीं चला कब रात हो गई थी । रात हो गई तो सभी बच्चे पानी पीकर सो गए । लेकिन किसी को नींद नहीं आ रही थी । सभी बच्चे भूख के मारे तिलमिला रहे थे । लेकिन कर भी क्या सकते थे । इस तरह बिना खाना खाए 3 दिन व्यतीत हो गये । तीसरे दिन गांव में एक बर्फ वाला आया । गुलाब की पत्नी ने ₹4 पर्स में से निकालकर बड़े लड़के राजेश को देकर सभी के लिए एक एक बर्फ का दूध वाला गोला लाने का आदेश दिया । राजेश दौड़ता हुआ बर्फ वाले के ठेले पर पहुंचा । उससे ₹4 की बड़ी-बड़ी दूध वाली बर्फ के गोले लेकर घर आ गया । सभी ने वह बर्फ बड़ी खुशी से खाई । उस बर्फ से सबकी जान में जान आई । गब्बर बताते हैं कि वह बर्फ उस दिन अमृत जैसी लग रही थी । उसके बाद सभी ने कुछ देर बातें की । और फिर सो गए । धीरे-धीरे रात हो गई । रात को सभी ने पानी पिया । और अपने अपने बिस्तर पर सो गए । अगले दिन सुबह उठे तो हलवा की खुशबू आ रही थी । दरवाजे पर जाकर देखा तो गुलजार चाचा हलवा बना रही थे । कोई भी हलवा गुलजार चाचा से नहीं मांग सका । तभी अचानक एक आम बेचने वाले की आवाज सुनाई देती है । सभी मां से कहते हैं । मां कहती है पहले यह देखो बाहर तुम्हारे पापा या फिर गुलजार चाचा तो तो नहीं है । उस समय बाहर कोई नहीं था । तो गब्बर की मां ने एक थैली में अनाज भर दिया । और कहां राजेश तू जल्दी जा और आम लेकर आ । राजेश तुरंत गया और 1 किलो दशहरी आम लेकर आया । सभी ने एक एक खाया और शेष बचे हुए मां ने रख दिए । साम के समय मां ने सभी बच्चों से कहा कि आज बहुत गर्मी है । गब्बर बताते हैं कि उस समय हमारे पास न तो सोने के लिए खटिया थी और नहीं एक भी कूलर , पंखा था । हमारा मकान भी कच्चा था । कई बार चूहे , छछूधर , बिच्छू , कनखजूरे और सांप आकर हमपर सोते समय रात में चड जाते थे । क्योकि हम जमीन पर सोते थे । मां ने छत पर चलकर सोने का आदेश दिया । गब्बर ने चटाई उठाई और सभी से कहकर ऊपर छत पर सोने के लिए चल दिया । उसके साथ ही सभी भाई बहिन और मां ऊपर के लिए चल दिए । ऊपर छत पर पहुंचकर कुछ देर बातें की । फिर छोटी बहन ने कहा भूख लग रही है । मम्मी ने कहा तुम सब यहीं बैठना । कोई भी नीचे मत आना । मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने के लिए लाती हूं । यह कह कर गुलाब की पत्नी ऊपर छत पर से सीढ़ियां से उतरकर नीचे कमरे में आती है । और वह सुबह के रखे हुए कुछ आमों को चूल्हे में भूंजने के लिए दे देती है । चूल्हे में लकड़ियों की तेज आग जल रही थी । क्योंकि थोड़ी देर पहले ही गुलाब और गुलजार ने वहां पर खाना बनाया था । पांच सात  मिनट में आम भुंज जाते हैं । गुलाब की पत्नी आमो को लेकर आमरस बनाने के लिए छीलकर एक स्टील के जग में पानी में आम के गूदे को निकाल लेती है । तब तक 20 मिनट हो जाते हैं । गब्बर ऊपर से नीचे अपनी मां को देखने आता है । कि मां खाने के लिए क्या बना रही है । लेकिन गब्बर जैसे ही कमरे में पहुंचता है । और अपनी मां को देखते ही वह दंग रह जाता है । क्योंकि उसकी मां एक जग में मामा के यहां से लाए हुए तेजाब में से 2 ढक्कन तेजाब जग मैं डाल देती है । यह सब गब्बर देख लेता है । अचानक से मां की नजर गब्बर पर पड़ती है । तो मां उस पर एकदम चिल्लाती है । नीचे क्यों आया । गब्बर चुपचाप बिना कुछ कहे दोबारा से ऊपर चला जाता है । कुछ ही देर में गुलाब की पत्नी गब्बर की मां उसी जग को जिस जग में उसने तेजाब डाला हाथ में लेकर और साथ में चार कटोरी लेकर ऊपर आ जाती है । लेकिन मां के डर से गब्बर किसी से कुछ नहीं कहता है । और चुपचाप बैठा रहता है । गब्बर की मां चारों कटोरी मैं आमरस को बच्चों को देकर एक कटोरी अपने पास रख लेती है । बड़ा भाई और छोटी बहन दोनों बड़े चाव से आमरस को पी लेते हैं । लेकिन गब्बर बडे भाई ओर छोटी बहिन की तरफ उनके चेहरों को देखता है । जब दोनो आमरस को पीकर अपनी कटोरी खाली कर देते हैं । तो उसके बाद गब्बर भी अपनी कटोरी को भगवान का नाम लेकर पी लेता है । लेकिन उसे अपने से ज्यादा अपने भाई और छोटी बहन की परवाह होती है । कुछ देर बाद सब सो जाते हैं लेकिन गब्बर को नींद नहीं आती है । क्योंकि उसे डर सताता है कि कहीं उसका भाई और छोटी बहन तेजाब से मर तो नहीं गए । जब सब सो जाते हैं तो गब्बर चुपचाप उठता है । सबसे पहले वह अपनी छोटी बहन की ओर देखता है । कि कहीं वह मर तो नहीं गई है । तो वह आराम से सो रही थी । लेकिन गब्बर को तसल्ली नही होती है । वह चुपके से अपने हाथ को अपनी बहन के दोनों नाकों के बीच रखकर देखता है । कि सांस चल रही है या नहीं । अगले ही क्षण उसे सुकून मिलता है सांस चलने का अनुभव हो रहा था । फिर वह अपनी मां की तरफ देखता है कि कहीं मां तो नहीं मर गई । वह कहता है मां मुझे बाथरूम जाना है । तो मां कहती है चले जाओ मैं जग रही हूं । गब्बर को सुकून मिलता है । चलो सब ठीक है । अब वह अपने बड़े भाई राजेश से कहता है । राजेस थोड़ा आगे चल मुझे गर्मी लग रही है और वह उसे धीरे से धक्का मारता है । जिसका राजेस को पता चल जाता है । तो वह कहता है क्या बात है मुझे क्यों धक्का मार रहा है । मैंने कहा मुझे गर्मी लग रही थी । अब सब सो जाते हैं लेकिन गब्बर को देर रात तक नींद नहीं आती है । और वह बार-बार पर सब को देखता रहता है । कि कहीं कोई मर तो नहीं गया । लेकिन प्रभु की कृपा से सब ठीक होता है । अगले दिन सुबह हो जाती है । सब नीचे आ जाते हैं । गुलाब की पत्नी जल्दी से सभी को नहाने के लिए कहती है । गब्बर बताते हैं कि उस समय हम छोटे थे इसलिए नहाने के नाम पर रोते थे । मां जबरदस्ती पकड़ कर हमें नहलाती थी । उस दिन मां ने कहा सभी जल्दी आ जाओ । और नहा लो । क्योंकि आज मामा के यहां चल रहे हैं । सभी अपने-अपने कपड़े उतार कर नहाने के लिए बाथरुम में आ जाते हैं । तीनों बच्चों को नहला देने के बाद गुलाब की पत्नी स्वयं नहाती है । और फिर बच्चों को नए कपड़े पहनाकर मामा के यहां ले जाती है । साथ में एक कनस्तर में कुछ गेहूं लेकर उनको बाजार में पिसवाने के लिए गब्बर के सिर पर रख देती है । उस कनस्टर का वजन 9 किलो था आज भी गब्बर को याद है । मामा के घर से थोड़ी दूरी पर उस गेंहूं के कनस्टर को पिसवाने के लिए गब्बर की मां एक चक्की पर डाल देती है । और हम सब फिर मामा के यहां पहुंच जाते हैं । मामा के यहां पहुंचते ही सभी लोग खुश हो जाते हैं । और छोटा भाई राजीव भी हमपर बहुत प्रसन्न होता है । क्योंकि हम 10 दिन बाद वहां पहुंचे थे । मामा और नानी भी बहुत खुश हो जाते हैं । इस बार मामा के यहां हम कम से कम 20 दिन रहते है । फिर एक दिन मामा के यहां से घर के लिए आते हैं । उस दुकान पर जाते हैं जिस दुकान पर जब हम आए थे तब हमने गेहूं पिसाने के लिए डाले थे । दुकान वाला कहता है के दीदी तुमने तो इतने दिन से इस कनस्टर को ले जाने का ध्यान ही नहीं दिया चलो कोई बात नहीं । उस कनस्टर को गब्बर अपने सिर पर रखकर अपनी मां के साथ बस अड्डे की तरफ चल देते हैं । बस वाले आटे का कनस्टर बस में रखने से मना कर देते हैं । तो फिर गब्बर की मां आगे टेंपो स्टेंड पर चल देते हैं । वहां उन्हे एक टेंपो मिल जाता है ।  जिसमें बैठकर सभी अपने घर की तरफ आ जाते हैं । घर का ताला खोलकर सभी बैठ जाते हैं । शाम के समय मां खाना बना लेती है । सभी खाना खाते हैं । और सो जाते हैं । इस तरह दिन 15 दिन बीत जाते हैं । फिर आटा खत्म हो जाता है । और पूरे परिवार पर एक बार फिर भूखे मरने की नौबत आ जाती है । इसी प्रकार दो-तीन दिन किसी भी तरह भूख में कट जाते हैं । चौथे दिन सुबह-सुबह गुलाब की पत्नी गब्बर की मां कमरे में झाड़ू लगाते लगाते दरवाजे तक पहुंचती है तभी अचानक रोज आने वाला एक भिखारी आता है और जोर से कहता है "सीताराम" । हम तो खुद 3 दिन से भूखे मर रहे थे । भिकारी को क्या देते तो हमारी मां ने भिकारी से कहा बाबा तुम रोज आते हो । एक काम करो आज हमारा आटा खत्म हो गया है हमें 1 किलो आटा दे जाओ । हम तुम्हें दो-तीन दिन बाद वापस कर देंगे । भिकारी ने कहा ठीक है कोई बात नहीं । गब्बर की मां ने भिकारी से 2 किलो आटा उधार ले लिया । और खुशी खुशी रोटी बनाई । सभी ने वह रोटी बिना सब्जी के नमक और पिसी लाल मिर्च रखकर उसमें थोडा सा पानी डालकर बड़े चाव से खाई । गब्बर बताते हैं कि हम मैसै किसी नै भी 3 दिन से कुछ नहीं खाया था । वह भोजन उस दिन हमें 56 भोग लग रहा था । तभी हमें पता चलता है कि हमारे पड़ोस में ही खान बाबा ने एक चक्की खोल ली है । तुरंत ही हमारी मां ने गेंहूं को बीनकर बड़े भाई राजेश को ₹3 देकर खान बाबा के यहां 15 किलो का गेहूं सिर पर रखकर पिसाने के लिए भेज दिया । अगले दिन गब्बर की मां ने उधार दिए हुए भिकारी के आटे को वापस कर दिया । हम सब बहुत खुश थे । और खाना-बाबा को बहुत धन्यवाद देते थे । कि उसने चक्की खोलकर बहुत अच्छा किया है । अब हमें भूखा नहीं रहना पड़ेगा । लेकिन अब रोज-रोज नमक और मिर्च से सूखी रोटी खा खा कर हम परेशान हो चुके थे । तो हमने कहा मम्मी आज तो कुछ सब्जी बना लो । तो मां ने कहा कुछ है ही नहीं । और बाजार से लाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं है । में क्या बनाऊं ? तो बड़े भाई ने कहा एक काम करते हैं । आज कोई है । तुम मुझे अनाज दे दो मैं गांव में ही ख्याली की दुकान से हरी धनिया और हरी मिर्च ले आता हूं । उनकी चटनी बांट लेंगे । तो मां ने कहा ठीक है ले जाओ । बड़ा भाई राजेश थोड़ा सा अनाज लेकर ख्याली की दुकान पर पहुंचा । और उधर से हरी मिर्च और धनिया ले आया । मां ने हरी धनिया और मिर्ची की चटनी बांट दी । सबने बड़े प्रेम से खाना खाया । और साम को सभी सो गए । इस तरह दिन बीत रहे थे । लेकिन बिना पैसे चोरी छुपके अनाज बेजना सही नहीं था । किसी ने गब्बर के पिता गुलाब से शिकायत कर दी । कि आपकी पत्नी बच्चों को भेज कर दुकान पर अनाज विचवाती है । गुलाब को गुस्सा आ गया । उसने कहा मैं तुझे एक खेत देता हूं उसके अनाज का तू कुछ भी कर । गुलाब ने एक ढाई बीघा खेत अपनी पत्नी और बच्चों को दे दिया । उसके बोने की जिम्मेदारी भी गुलाब की पत्नी को मिली । गुलाब ने स्पष्ट कह दिया मैं इस खेत में एक भी पैसा नहीं लगाऊंगा । तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करो । अब खेत के बुआई का समय आया । तो खेत को बटाई से करने वाला मजदूर घर आया । और उसने खेत की बुआई के लिए कुछ रुपए मांगे । लेकिन गुलाब की पत्नी पर उस समय एक भी रुपया नहीं था । तो उसने बाद में देने का वादा कर दिया । खेत बोये जा रहे थे । उस दिन गुलाब की पत्नी ने अपने दो बेटे राजेस और गब्बर को खेत पर भेज दिया । और यह कहा कि खेत बो जाए तब आना । उसके बाद उस खेत की 5 परिक्रमा लगाना । और हाथ जोड़कर आना । मैंने और राजेश ने हां कह दिया । दोनों खेत पर चले गए । राजेश ने मां के कहे अनुसार खेत की परिक्रमा नहीं की । मैंने खेत की 5 परिक्रमा दे रहा था । तो वहां बैठे बहुत से लोग मुझ पर हस रहे थे । लेकिन मैंने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया । मैंने मां के कहे अनुसार खेत की पांच परिक्रमा की । अंत में हाथ जोड़कर प्रणाम किया । फिर हम दोनों भाई घर आ गए । फिर एक दिन हमारी मां ने यह सोचा इस तरह जीने से कोई फायदा नहीं है । तो उन्होंने एक दिन अपने पति गुलाब की परीक्षा लेनी चाही । कि इनका बाप अपने बच्चो से प्यार करता है या नहीं । इस खतरनाक परीक्षण लिए गब्बर की मां ने गब्बर को ही चुना । एक दिन गुलाब की पत्नी ने सुबह-सुबह गब्बर को नहलाना शुरू किया । मेरे पैरो में धूल में खेलने की वजह से बहुत अधिक मेल जम रहा था । उसको पत्थर की सहायता मां नहाते समय निकाल रही थी । मैं जोर जोर से रो रहा था । लेकिन मां नहीं मान रही थी । तभी अचानक मेरे पिताजी गुलाब बाहर से उठकर कूऐ पर आए । और मुझे वहां से हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गए । थोड़ी देर बाद कुए पर से मां अंदर चली गई । तो पिताजी ने मुझे नहला दिया । फिर वे मुझे अपने यहां ही ले गए । मेरे पापा गुलजार चाचा के साथ उनके कपड़े में रहते थेगुलजार चाचा बोले तू हमारे यहां ही रह जा वहां मत जा मैं उस समय छोटा था मुझे अपने भाई और बहन के बिना बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था जिस समय मैं मां से अलग होकर पिता जी के यहां रहने पहुंचा उस समय फरवरी मार्च का महीना था मेरे भाई बहन और मां मुझसे बोलते नहीं थे मुझे बहुत दुख होता था एक दिन मेरा बड़ा भाई और छोटा भाई दोनो कहीं से बेर तोडकर लाए और मुझे दिखा कर खा रहे थे लेकिन मुझे मां के डर से एक बेर तक खाने को नहीं दिया मैं सामने बैठ गए देखता रहा गुलजार चाचा ने कहा कल गब्बर को भी अपने साथ बेर लेने के लिए ले जाना लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा वह रोज शाम के समय बेर लेने के लिए जाते थे एक दिन मैंने भी उनके साथ जाने का प्लान बनाया लेकिन वह मुझे अपने साथ ले जाना नहीं चाहते थे क्योकि मे उनसे अलग होकर पिताजी के साथ दूसरे कमरे में रहता था फिर भी दूसरे दिन में दोपहर 2:00 बजे से ही दरवाजे पर बैठ गया कि कब मेरे भाई बेर लेने के लिए जाएं और मैं बिना बताए उनके पीछे पीछे चला जाऊं धीरे धीरे शाम का समय हुआ तो वो लोग बेर लाने के लिए पौलीथिन ढूंढने लगे मैं बहुत खुश हो गया चलो अब यह जाने वाले हैं मैं चुपके से उनके पीछे जाने को तैयार हो गया दोनों भाई बेर लेने के लिए घर से निकल पड़े पीछे पीछे मैं भी उनके साथ चल रहा था वह करीब 1 किलोमीटर दूर एक बेर के पेड़ के पास पहुंचे और पत्थर मार-मार कर उनसे बेर झराने लगे थोड़ी देर में मैं भी वहां पहुंच गया और मैंने भी बेर इखट्टे करने शुरू कर दीए तभी उन्हें अचानक पता चला कि एक गांव की ही खतरनाक पागल उनकी तरफ आ रही है उसके आने से पहले ही दोनों भाई वहां से रफू चक्कर हो गए लेकिन मुझे उसका पता नहीं चला कि यह लोग क्यों भाग गए हैं मैं यह समझ रहा था यह वैसे ही चले गए है मैं बेर तोड़ने में मस्त रहा तभी थोड़ी देर में वह पागल मेरे पास आ जाती है और मेरी गर्दन पकड़ लेती है मैं अचानक से बुरी तरह डर जाता हूं लेकिन कर भी क्या सकता था वह पागल मुझसे सारे बेर छीन लेती है और मुझमें जोर से धक्का मार देती है मैं जैसे तैसे उससे अपनी जान बचाकर घर आता हूं तो दोनों भाई ताली दे देकर मुझ पर हस रहे थे के पागल ले इसकी गर्दन पकड़ ली थी और इसके सभी बेर छीन ले गई और रहेगा क्या पापा के साथ में । मैं शांत बैठा रहा कर भी क्या सकता था मैंने अपने भाइयों से कहा तुम्हारी तरफ आने के लिए मुझे क्या करना पड़ेगा यह बात मेरी मां ने सुन ली मम्मी ने कहा कि तुझे कल सुबह अपने बाप के आगे यह बात कहनी है मैं कि मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगा में तैयार हो गया दूसरे दिन मैंने पापा के आगे यह बात कह दी कि पापा मैं तुम्हारे साथ नहीं रहूंगा मुझे तो मम्मी के साथ रहना है पापा ने कुछ नहीं कहा अब एक बार फिर गब्बर को अपनी मां और भाइयों के साथ रहने का मौका मिल गया । गब्बर अब अपनी मां और भाइयों के साथ बड़े प्रेम से रहने लगता है । सुबह-सुबह तीनों भाई खाना बनाने के लिए लकड़ी लेने जाते हैं । लकड़ी लेने के लिए बिना डर के बड़ी-बड़ी झाड़ियों में प्रवेश कर जाते हैं । इस तरह उनका रोज का काम बन जाता है  । इस तरह से दो महीने बीत जाते हैं । फिर हमारी मां सभी को लेकर फिर मामा के यहां चली जाती हैं । और वहां रहकर अपना बुरा समय निकालते हैं । ज्यादा दिन तक रहने से नानी को बुरा लगता है । फिर वह हमें सबसे ऊपर के कमरे को रहने के लिए दे देती है । उस कमरे में हम सब बच्चों को बहुत डर लगता था । क्योंकि उनके मकान पर सदैव बंदर आ जाया करते थे । बंदरों से गब्बर और गब्बर के सभी भाई बहन बहुत डरते थे । जो कमरा हमें नानी ने रहने के लिए दिया था । उसने दरवाजा नहीं था । वह बिल्कुल खुला था ।  इसलिए उस कमरे में दो-तीन दिन में एक दो बंदर अवश्य दस्तक दे जाते थे । लेकिन हम कर भी क्या सकते थे । हम ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर थे । बंदर हमेशा दिन के उजाले में ही आया करते थे । परन्तु  उनका निश्चित समय नहीं था । कि दिन में कब टपक पड़ें । सुबह जल्दी उठकर हम उस कमरे से नीचे चले जाते थे । नीचे कुछ सुनार लोगों के छोटे छोटे बच्चे रहते थे । उन लोगों से हमने दोस्ती कर ली । उनके साथ ही खेलते कूदते थे और साथ-साथ पढ़ते थे । सुनार के बच्चे जहां ट्यूसन पढ़ने जाते थे । वह टीचर हमारे मामा का दोस्त था । उसका नाम भल्ला सर था । भल्ला सर हमें फ्री में पढ़ाते थे ।       एक दिन सुबह के समय मैं अकेला घूमते हुए करीब 1 किलोमीटर दूर एक पुरानी राजा की गढी पर पहुंच गया । वहां पर मुझे सुनार के बच्चे खेलते हुए नजर आए । मैं भी उनके साथ खेलने लगा । हमने मामा और नानी से सुना था कि राजा की गढ़ी पर भूतों का बसेरा है । हमारी नानी बताया करती थी कि पुराने समय में गड़ी में एक राजा और रानी रहा करते थे । एक बार उनके छोटे भाई ने छल से अपने छोटे 7 साल के पुत्र को एक खीर के कटोरे में जहर मिलाकर दे दिया था । जिसे राजा और रानी ने छोटे वालक और अपने छोटे भाई पर विश्वास करके दोनों ने बिना कोई संकोच किए खा लिया था । जिससे दोनों की जान चली गई । छोटे भाई ने चुपके से गड़ी में ही दोनों को पीछे खाई की तरफ रात में दफना दिया था । वह राजा और रानी खतरनाक भूत बन गए हैं । और जो बच्चा वहां आ जाता है वह बिना मरे वहां से नहीं जाता । वहां पर आए दिन बच्चे मरे हुए मिलते रहते थे । हमारी नानी और मामा ने हमें वहां जाने से मना कर दिया था । लेकिन हमें पता नहीं था कि वह राजा की गढ़ी कहां पर है । और हम वहां कभी गए नहीं थे । हम खेलते हुए उसे गढी में भीतर प्रवेश कर जाते हैं । तभी मुझे कहीं से किसी के जोर जोर से हंसने की आवाज सुनाई देती है । मेरे ऊपर कुछ चक्कर सा हो गया । मैं ऊपर देखता हुआ सीधे खाई की तरफ चला जाता हूं । मुझे पता नहीं चल रहा था मैं कहां जा रहा था । और अचानक से उस खतरनाक खाई में गिर गया था । लेकिन संयोगवश उस खाई में 10-15 फुट नीचे  एक पीपल का पेड़ खाई की दीवाल में से उगा था । जो बहुत पुराना और घना था । मैं उसी पीपल के पेड़ में जाकर अटक गया ।  कुछ लोग वहां बैठकर बातें कर रहे थे । उन्होंने मुझे गिरते हुए देख लिया था । वे लोग तुरंत ही दोड़कर मेरे पास आए । और एक आदमी ने पीपल के पेड़ के पास पहुंचकर मुझे पकड़ लिया और दूसरे से रस्सा लाने को कहा । अब मैं होस में था । एक आदमी ने रस्सी से उतर कर पीपल के पेड़ से मुझे गोद में पकड़कर नीचे उतारा था । मुझे वो दिन आज भी याद है । उस दिन यदि वह पीपल का पेड़ ना होता तो मेरी जान नीचे पत्थरों पर गिरकर चली जाती । मेरी जिंदगी बचाकर सब लोगों ने मुझसे कहा कहां से आया है । तो मैंने कहा मेरे सभी दोस्त कहां है । वो लोग मुझ पर हंसने लगे और मुझसे कहा अपने घर जा किसका लडका का है तू । यहां तू अकेला आया है । अब एक काम कर उस राजा रानी द्वारा बनाए गए राम मंदिर में जाकर भगवान से यह कह दे कि मेंं एक अच्छा लड़का हूं । मैंने राजा रानी को जहर नहीं दिया है भगवान जी । राजा रानी को बता दो । उन लोगों ने मुझसे कहा था मैंने वैसा ही किया । फिर उन लोगों ने मुझसे घर जाने को कहा । और मुझे थोड़ी दूर तक छोड़कर वो चले गए । मैं अपने मामा के घर आ गया । मैंने किसी से कुछ नहीं कहा था । मेरे हाथ और पैर में थोड़ी सी चोट लग गई थी उस से थोड़ा सा खून निकला था । उस दिन में चुपचाप दिन के समय सो गया । जब शाम के 4:00 बजे तो नीचे से सुनार के लड़के मुझे ट्यूसन पर जाने के लिए बुलाने आए । मैं चुपचाप किताब लेकर ट्यूशन के लिए चला गया । लेकिन मैं उनसे बोल नहीं रहा था । 1 घंटे बाद ट्यूशन से छुट्टी हो गई । तो सुनार के लड़कों ने मुझसे कहा गब्बर तू आज हमसे बोल क्यों नहीं रहा है क्या हो गया है तुझे । मैंने उनसे चुपके से कहा खाई में धकेल कर यहां आ गए । अब कहते हो कि बोल क्यों नहीं रहा है । बड़े शातिर बच्चे हो तुम । वह लोग कहने लगे क्या कह रहा है तू । हमारी समझ में नहीं आ रहा है ।  हमने तुझे कब खाई में धकेला था । मैंने कहा आज दोपहर 12:00 बजे तो उन्होंने मुझसे कहा गब्बर मेरे साथ मेरे घर आना । मैं उसके घर चला गया । उसने अपनी मम्मी से कहा मम्मी हम दोनों भाई आपके और पापा के साथ आज सुबह 8:00 बजे कहां गए थे । उनकी मम्मी ने कहा शीतला माता के मंदिर गए थे । दूसरे भाई ने पूछा वहां से हम कितने बजे वापस आ गए थे । तो उनकी मां बोली करीब 3:30 बजे आए थे । वहां से आकर तुम सीधे ट्यूशन के लिए चले गए थे । दोनों ने कहा अब तो ठीक है । मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि कौन सही है और कौन गलत है । लेकिन मैंने उनकी बातों पर विश्वास कर लिया था । लेकिन वह बात मैंने आज तक किसी को नहीं बताई थी । क्योंकि बताता तो मेरी पिटाई होती कि तू वहां क्यों गया था । दूसरे दिन हमारी मां ने घर आने का प्लान बना लिया । मेरे मामा ने मुझे अपने यहां ही रहने के लिए कहा मैं रहने के लिए तैयार हो गया । मेरी मां बड़े और छोटे दोनों भाइयों और छोटी बहन को लेकर अपने घर ससुराल पहुंच जाते हैं । तीनों घर आ जाते हैं । और मेरा बड़ा भाई राजेश चुपचाप पापा की साइट रहने चला जाता है । लेकिन मुझे पता ही नहीं चल पाता कि किस कारण से वह पापा के साथ रहने के लिए गया था । एक महीने बाद मां फिर से मामा के यहां पर रहने के लिए आ जाती है । मैंने देखा राजेश नहीं आया है । मैंने मां से पूछा मां ने बताया वह तो तेरे पिता के साथ रहने लगा है । मैं शांत रह गया । हम सभी बच्चे खेलने में व्यस्त थे । लेकिन हमारे ट्यूशन का समय हो गया था हमारे मामा के दोस्त भल्ला सर हमें फ्री ट्यूशन पढ़ा तो देते थे लेकिन मार भी बहुत दे देते थे । राजीव उससे बहुत डरता था । वह भल्ला सर के डर से ही मामा का घर छोड़ कर गया था । भल्ला सर से डरता तो मैं भी था । डर के मारे सबसे पहले मैं ट्यूसन का काम करता था । उसे दिन राजीव आया था तो मैंने खेलने में ट्यूशन के काम का ध्यान नहीं दिया था । और उस दिन मेरा ट्यूशन का काम नहीं हो पाया था । जब ट्यूशन का समय हो गया तब मुझे यह बात पता चली । मैं बिलबिलाने लगा । इसलिए राजीव ने कहा एक काम करते हैं । गब्बर आज तुम्हारा ट्यूशन का काम नहीं हुआ है और आज मैं भी आ गया हूं तो तुम मुझे भी ट्यूशन जाना पड़ेगा । एक काम करते हैं बाजार घूमने निकल चलते हैं । ट्यूशन का टाइम खत्म हो जाएगा तब आएंगे । मुझे भी यह आईडिया सही लगा । हम रेलवे स्टेशन की तरफ ट्रेन देखने चल दिए । जैसे हम रेलवे स्टेशन पर पहुंचे । थोड़ी देर बाद ट्रेन आ गई । हमें उस समय ट्रेन देखना बहुत पसंद था । हम बहुत खुश होकर ट्रेन को देख रहे थे । तभी अचानक ट्रेन में से ट्यूशन वाले सर हमको उतरते हुए दिखे । हम एकदम से डर गए । और हमसे पूछा यहां क्या कर रहे हो । क्या आज ट्यूशन नहीं जाना क्या । और राजीव कब आ गया । तो मैंने कहा सर राजीव आज ही आया है । और मम्मी ने गेहूं का बीज तलाशने के लिए कहा है इसलिए हम यहां आए हैं । सर का घर रेलवे स्टेशन से करीब 500 मीटर दूर था । उन्होंने हम दोनों को अपने साथ एक रिक्शा में बैठा कर उनके घर आ गए । घर पहुंचे तो 4:00 बज चुके थे और ट्यूशन का समय हो गया था । अब भल्ला सर ने हमसे कहा जल्दी से अपनी कॉपी लेकर आओ । लेकिन मेरा तो काम हुआ नहीं था । मैं कॉपी लेकर आया । उस दिन मुझमें चार पांच चांटे पड़ गये । बचपन में मेरा छोटा भाई राजीव मुझसे बहुत प्यार करता था मामा कुछ खाने की चीज लाते और सभी को बराबर बराबर देते थे । राजीव अपने हिस्से में से अलग से मुझे खाने को देता था । बड़ा भाई राजेश भी मुझे बहुत चाहता था । जब मम्मी को मामा के यहां रहते हुए एक महीना बीत गया तो 1 दिन हमारा बड़ा भाई राजेश मामा के यहां हमें देखने आया हमने खूब मस्ती की छत पर क्रिकेट खेले तो अचानक से हमारी गेंद पीछे की तरफ चली गई वहां पर कचरा फेंकते थे । और नाले की बहुत गंदगी रहती थी । तो वहां पर कोई जाता नहीं था । और हम दोनो छोटे भाइयों को वहां जाने से डर लगता था । वहीं पर हमारी पहले की एक दो गैंद और पड़ी हुई थी । बड़ा भाई राजेश गेंद को लेने के लिए बिना मम्मी को बताए चला गया । और सभी गेंदों को ले आया । हमें उस दिन बहुत खुशी हुई थी । फिर हमने छत पर खेलना बंद कर दिया कि गेंद दोबारा चली जाएगी । ऊपर कमरे में बैठकर ख़ूब सारी घर की  की बातें करते रहे । उसने कहा मम्मी मैं यहां पर शक्कर की कहने आया हूं । कंट्रोल से शक्कर आ गई है । अपनी शकर को अपने कमरे में रख आओ । मम्मी ने मुझे कमरे की चाबी दे दी । और वहां पर खेलकूद कर 2:00 बजे के समय राजेश और में गांव की तरफ चल दीए । गांव में आकर हम दोनों भाई पहले तो क्रिकेट खेले फिर हम गिल्ली डंडा खेले । धीरे-धीरे शाम होने का समय आया तो गुलजार चाचा ने शक्कर तोल दी । मैंने कमरे का ताला खोलकर  कुकर में शक्कर रख ली । और उसका ढक्कन लगाकर भीतर अलमारी में रख दिया । फिर मैंने कमरे का ताला लगा दिया । फिर मेरा बड़ा भाई मुझे बस में बिठाने के लिए ले गया । और मुझे बस में बैठा दिया । मैं दोबारा से मामा के घर पहुंच गया ।  और मम्मी को बता दिया कि शक्कर कुकर में रख आया हूं । मम्मी ने कहा ठीक है दो-तीन दिन बाद यहां से चलेंगे फिर देख लेंगे । मामा के पड़ोस में रहने वाले सभी लोगों को यह बात पता चल गई । कि इनके घर वाले इन्हें बहुत दुखी कर रहे हैं ।  इसलिए अपने मायके में यहां रहती है । तो पड़ोस में सभी अच्छे लोग थे । पड़ोस की एक औरत ने कहा ननद जी मैंने अपने आदमी से आपके इन दोनों बेटों को दुकान पर रखने के लिए बात कर ली है । आप इन दोनों को दुकान पर भेज दिया करो । मैं और राजीव दोनों उस पड़ोस वाले धम्मा मामा की दुकान पर जाने लगे । जब एक महीना हुआ तो उन्होंने हमारी मां को 100 रुपए दिए । जिससे हमारी मां  बहुत खुश हुई । लेकिन हमारी नानी हमारे ज्यादा दिन तक वहां रहने से जलने लगी थी । वह हमारी मां पर जरूरत से ज्यादा काम कराती थी । खुद कुछ नहीं करती थी । सुबह से लेकर शाम तक के सारे काम हमारी मां करवाती थी । इतना सारा काम करने के बाद भी वह हमारी मम्मी और हमसे गालियां देती थी । जो हमसे सहान नहीं होती थी । लेकिन हम कर भी क्या सकते थे । हमारी मां चुपचाप गाड़ियों को सहन करके काम करती जाती थी । एक दिन दोपहर के समय हम दोनों भाई दुकान पर से खाना खाने नानी के यहां आए । तो नानी ने शाम की खराब हो चुकी रोटी सब्जी हमें खाने को दे दी ।  जिसका हमारी मम्मी को पता था कि यह खाना खराब है । तो हमारी मां ने नानी से कहा कि मम्मी यह रोटी खराब हो चुकी है । इनको खाने से मेरे बच्चे बीमार हो जाएंगे । तो नानी बोली तुझे ज्यादा दिखता है क्या ? अच्छी रोटी रखी हैं उन्हें खराब कहती है । तो एक रोटी उठाकर हमारी मां उस औरत के पास जाती है जिसकी दुकान पर हम दोनों भाई काम करना सीख रहे थे । वह औरत कहती है नन्द जी ये रोटी तो खराब है इनको बच्चों को मत खाने दो । अभी मैं रोटी बना देती हूं बच्चों को यहां ले आओ । यहां खा लेंगे ‌। मम्मी बापस नानी के यहां आ जाती हैं । पीछे से है वह औरत आ जाती है । जिसकी दुकान पर हम काम करने जाते थे । वह कहती है क्यों अम्मा यह बच्चों को क्या जहर खिला रही है ? तू नानी कहती है क्या हो गया और क्यों बड़बड़ा रही है ? हमारी मां हमें चुपचाप वहां से उठाकर ले जाती है । मेरे सेठ की घरवाली हमारे लिए रोटी बनाती है हम दोनों भाई अच्छे से खाना खाकर दुकान की ओर चले जाते हैं । उस दिन ही हमारी मां वहां से अपने ससुराल की ओर आ जाती है । अब हम रोज सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर अपने घर से ही बस से रोज दुकान पर जाने लगते हैं । अगले महीने हमें ₹150 तनखा मिलती है । उस समय बस से हम दोनों का ₹1 दोनों के 50 50 पैसे एक तरफ का किराया लगता है । हम घर से सुबह 6:00 बजे ही नहा धोकर निकल जाते थे । हम घर से सिर्फ गैंहू के आटे की रोटी लेकर आते थे । और उन रोटियों को दुकान वाले के घर पर रख देते थे । दुकान वाले की घरवाली हमें अपने बेटों से भी ज्यादा प्यार करती थी । दुकान वाले की घरवाली हमें रोज रोटी पर लगाने के लिए घी देती थी । हर रोज वह हमैं सब्जी भी देती थी इतना ही नहीं वह जो कुछ भी बनाती है वह हमारे लिए अवश्य रखती थी । हम खाना खाकर दुकान पर चले जाते थे । बर्तन भी वो खुद ही धोती थी । जब हम खाना खाते तो सभी कामों को छोड़कर हमारे साथ ही बैठ जाती थी । और हमें अच्छा ठंडा फ्रिज का पानी पीने को दे दी थी । बड़े प्यार से हमारे सिर पर हाथ फेरती थी । और कहती थी तुम्हें कभी भी किसी भी चीज की जरूरत पड़े अपनी मामी को बोल देना । उनके दो बच्चे और एक बच्ची थे । एक बच्चा बड़ा और एक छोटा था बच्ची बीच वाली थी ।  जो हम से करीब 7 साल बड़ी थी । छोटा बच्चा मुझसे करीब 3 साल बड़ा था । उनके बच्चे भी हमसे कभी नहीं जलते थे । और हमें अपना ही छोटा भाई समझते थे । हम करीब 12:00 और 1:00 के बीच में खाना खाने आते थे । कभी-कभी उनकी घरवाली नहीं होती तो उनकी बेटी भी हमको बड़े प्यार से बिठाकर अच्छे से खाना खिला देती थी । शुक्रवार के दिन बाजार बंद रहता था । उस दिन हम उनके घर पर रहकर खूब मस्ती करते थे । उनके यहां किसी भी कमरे में हम चले जाते थे लेकिन कोई कुछ नहीं कहता था । उनके बेड पर और उनकी टीवी में खूब गेम खेलते रहते थे । इस तरह हमारा समय बीत रहा था । राजीव और में हम दोनों भाई धीरे-धीरे दुकान के कामों में होशियार होते जा रहे थे । तो उनकी दुकान पर काम करने वाला पुराना नौकर हम दोनों भाइयों से जलने लगा था । एक दिन उसने हम दोनों भाइयों को दुकान से हटाने का प्लान बनाया । उसने कहा सेठजी यह दोनों बालक अपनी दुकान से खिलौनों को अपने दोस्तों को दे देते हैं क्योंकि इनका बड़ा भाई राजेश और इनके दोस्त तुम्हारे पड़ोस में रहने वाले सुनार के बच्चे दुकान पर अक्सर मिलने आते रहते है । कल इनके पास रिमोट वाली कार थी । दोपहर के समय तुम्हारा लड़का शनि और यह दोनों खेल रहे थे । और आज वह मिल नहीं रही है । कल दुकान में चला रहे थे । इस तरह का झूठा इल्जाम लगाया । आज सुबह जब में आया था तब तुम दुकान में अन्दर थे । और ये पैसों के गल्ले में हाथ डाल रहा था । सेठ ने नौकर की बात पर विश्वास कर लिया । और उसने तुरंत मुझे आवाज लगाई ए गब्बर ! इधर आना । मैं तुरंत पहुंचा । और मैंने कहा क्या कह रहे हो मामा जी । उन्होंने मुझसे कहा अपनी जेब दिखाना । मैंने सेठ को अपनी सभी जेब दिखाते हुए कहा मामा में घर से 50 पैसे के दो सिक्के यानी कि ₹1 किराए के लिए लाया था । जिसमें से 50 पैसे मेरे सुबह जब में घर से आया था तब बस में किराए में खर्च हो गए 50 पैसे बचे हैं जो मेरी जेब में पड़े है । मैंने उसे अपनी जेब दिखा दी । 50 पैसे के अलावा मेरी जेब में कुछ नहीं निकला था । सेठ ने भी मुझसे कुछ नहीं कहा । नौकर ने कहा सेठ जी कल में तुम्हें हकीकत दिखाऊंगा तब तुम्हें विश्वास होगा सेठ ने कहा ठीक है । दूसरे दिन सेठ जानबूझकर अंदर बैठ गया और वहां से छिपकर हम दोनों भाइयों को देखने लगा । तभी अचानक एक ग्राहक आया और वह धागे की नलकी मांगने लगा । उस समय बड़ी नलकी जिसे (धागे की रील) एक रुपए 50 पैसे की आती थी उसने मुझे 10 का नोट दिया । सेठ अंदर से मुझे छिपकर देख रहा था । मैंने कहा मामा जी इन्होंने दो नलकी ली है मुझे 10 का नोट दिया है । उसने कहा मैं भीतर हूं । मुझे नहीं पता तू ₹7 वापस कर देना । मैंने 10 के नोट को पेटी में अंदर डाल दिया और ₹7 बापिस कर दीए । थोड़ी देर बाद सेठ आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया । और उसने मुझसे ₹5 के  पोआ बाजार से लाने के लिए कहा । सेठ ने थोड़े से हाथ में लिए और बाकी सब मुझे खाने को दे दिए । मैं पोआ खा रहा था । तब तक नौकर आ गया । सभी अपने-अपने काम ग्राहकों को सामान दिखाने में लग गए । गर्मियों का मौसम था । दोपहर के समय में सेठ का लड़का दुकान पर आया । और उसने अपने पापा को खाना खाने के लिए घर भेज दिया । जब सेठ खाना खाने चला गया । तो नौकर ने दुकान में से ₹5 के इंदिरा गांधी के पोस्ट ऑफिस के 20 टिकट निकाल कर मेरी जेब में रख दिए । और मुझसे कहा कि 1:00 बजे तू मुझे तहसील में मिलना । वहां पर चुपचाप मुझे इन टिकटों को देने आ जाना । और हां इस बात की चर्चा किसी और से मत करना । बाथरूम का बहाना लेकर मेरे पास आ जाना । में जा रहा हूं । हमारी दुकान तहसील चौराहे पर ही थी । दुकान से तहसील करीब 100 मीटर दूर थी । उस समय में बहुत छोटा था । नौकर की दुष्टता को समझ नहीं पाया । जैसा नौकर ने मुझसे कहा था मैंने वैसा ही किया । 1:00 बजे के समय जब मैं सेठ के लड़के से बाथरूम की कहकर तहसील में पहुंचा । तो सेठ और नौकर दोनों वहां बैठे थे । और सेठ ने मुझसे कहा अपनी जेब दिखाना । मैंने उसे जेब दिखाएं । तो मेरी जेब में इंदिरा गांधी के 20 टिकट निकले । उसे टिकटों के बारे में सही बताया । तो पास में बैठे नौकर ने सेठ से कहा यह झूठ बोल रहा है । इन टिकटों को यह दुकान से चुराकर यहां पर बेचने के लिए लाया है । तभी अचानक वहां एक आदमी आ जाता है । और वह कहता है आज कितने रुपए के मार लाया है ।  इतना कहते हैं सेठ मुझे जोर से थप्पड़ मारता है । और अभी जल्दी से दुकान पर आने को कहता है । मैं जैसे ही दुकान पर पहुंचता हूं । वह मुझे वहां से निकलने के लिए कहता है । मैं चुपचाप चप्पल पहनकर घर के लिए चलने लगता हूं । तो मेरा छोटा भाई राजीव भी सेठ से घर जाने की पूछता है सेठ कह देता है तू भी जा चल । इस तरह हमारी अच्छी खासी नौकरी चली जाती है । और हम दोनों भाई निरास होकर दोपहर के समय में ही अपने घर आ जाते हैं । घर पर हमसे मम्मी पूछती है आज जल्दी घर क्यों आ गए । तो मैं उन्हें सारी बात बता देता हूं । मम्मी कुछ नहीं बोलती शांत रहती है । दो-तीन दिन के बाद फिर हमारी मां हम तीनों को लेकर मामा के यहां जाती है । और दुकान वाले की घरवाली से मिलकर हमारे हटाने का कारण पूछती है । दुकान वाले की घरवाली हमारी मां को सारी बात बता देती है । पूरी बात को सुनकर मेरी मम्मी मुझ पर बुरी तरह भड़क जाती है और वहीं पर एक डंडे से मेरी पिटाई शुरू कर देती है दुकान वाले की घरवाली को सही नहीं पता था कि सत्य क्या है । और गलत क्या है । हम एक गरीब परिवार के बच्चे थे इसलिए सबको हम ही गलत लग रहे थे ।  इतना होने के बावजूद भी दुकान वाले की घरवाली ने हमारी मां को मुझे दुबारा से दुकान पर लगाने के लिए आश्वासन दिया । उसने हमारी मां से कहा मैं आज रात को इनसे से बात करूंगी । दूसरे दिन सेठ की घरवाली के ज्यादा कहने पर सेठ अकेले मुझे ही दुबारा से दुकान पर लगाने के लिए तैयार हो जाता है । मैं फिर से दुकान पर जाना शुरू हो जाता हूं । अबकी बार पहले दिन से ही वो सेठ मुझसे गधा मजबूरी करवाने शुरू कर देता है । सेठ ने कंट्रोल के एक सरकारी आदमी से मिलकर केरोसिन बेचने का धंधा शुरू कर दिया था । वह कंट्रोल से सस्ते दामों में केरोसिन खरीद कर उसे बाजार में महंगे दामों में बेचने लगा ।  सेठ मुझे रोज की 100 लीटर केरोसिन घर तक पहुंचाने के काम के अलावा घर वाले तीन गोदामों से दुकान का सारा सामान लोडिंग की जगह मुझसे मगाना शुरू कर देता है । मैं थोड़ा थोड़ा करके पूरे दिन ढोता रहता हूं । पहलै तो सुबह घर से जाकर सेठ के लड़के को अपने साथ ले जाकर दुकान को खुलवाता हूं । फिर पूरी दुकान को में अन्दर से फटकार के झाड़ू लगाता हूं । उसके बाद पूरी दुकान में हाथ में कपड़ा लेकर उससे पोंछा लगाता हूं । फिर दुकान  के बाहर झाड़ू लगाकर वहां पर दूर टंकी से पानी लाकर छिड़काव करता हूं । तब तक सेठ आ जाता है फिर उसके बाद दुकान से बाहर सामान जमाता हूं । इस तरह दुकान पूरी तरह खोलते हुए 10 बज जाते हैं । फिर मैं घर से सेठ के लिए फ्रीज की पानी की बोतल और नाश्ता लेने जाता हूं । तब तक कैरोसिन वाली कंट्रोल खुल जाती है । फिर सेठ मुझे 10 लीटर की कैन हाथ में देते हुए कहता है । इसे ले जाकर कंट्रोल वाले के यहां चले जाओ ।  उससे कहना कि मुझे धम्मा सेठ नहीं भेजा है । मैं कैन ले जाकर कंट्रोल वाले के यहां पहुंचा । जैसा मुझसे सेठ ने कहा था वैसा ही मैंने जाकर कंट्रोल वाले को कह दिया कि मुझको धम्मा सेठ ने भेजा है । उस तेल बांटने वाले ने मेरी तरफ देखा और मेरे हाथ से प्लास्टिक की कैन को लेकर उसमें 10 लीटर तेल भर दिया । और मुझसे कहा ले जाओ । उस समय मेरी उम्र करीब 10 वर्ष थी तो मुझसे वह 10 लीटर की कैन उठ नहीं रही थी । मैं उसको जबरदस्ती दोनों हाथों से पकड़ कर धीरे धीरे दुकान तक लाया । तो सेठ ने मुझसे कहा कि इसको घर ले जाओ और खाली कराकर ले आना । में धीरे-धीरे दोनो हाथों से पकड़ कर सारे बाजार में रखते हुए उस कैरोसिन को सेठ के घर तक ले गया और उसे खाली करने के लिए कहा सेठ की घरवाली ने उस कैन को एक ड्रम में खाली कर दिया । और मुझे खाली कैन देदी । मैं उस कैन को लेकर दुकान पर पहुंच गया । तो सेठ ने मुझसे कहा फिर चले जाओ मैं दोबारा गया और फिर से कैन को केरोसिन से भराकर लाया । और धीरे धीरे घर तक पहुंचाया । इस तरह उस दिन मेने साम तक 10 कैन घर तक पहुंचायी थी । उस दिन सेठ ने खुश होकर मुझे 2 रूपए अलग से बाजार में कुछ चीजें खाने के लिए दिए थे । लेकिन मैंने रुपए लेने से मना कर दिया । फिर उन्होंने मुझू ₹1 देकर कहा कि बाजार से गन्ने का जूस पी लेना । और उन्होंने मुझे जबरदस्ती दे दिया । उस समय हम बहुत गरिब थे । कभी कभी हमसे बस वाले बच्चे समझकर किराए के पैसे नहीं लेते तो हम उनको ढेरों दुआऐ देते थे । और उन 50 पैसों को बड़ी खुशी से अपनी मां को वापस देते थे ।  उस दिन मेने वह रुपया अपनी मां को  घर जाकर दे दिया था । तो मां ने सोचा कि कहीं यह चोरी तो नहीं कर लाया । तुरंत ही मां दूसरे दिन घर से मामा के यहां आई । मुझे बताया नहीं कि मैं आज जाऊंगी । और मेरी मां ने उस एक रुपए के सिक्के की सारी बात सेठ की घरवाली को बताई । तो वह बोली मुझे पता नहीं अभी वह खाना खाने आएंगे तो मैं उनसे पूछ लूंगी । तभी मैं दुकान का सामान लेने के लिए घर पहुंचा तो मुझे वहां पर मेरी मम्मी दिखीं । मैंने कहा मुझे क्यों नहीं बताया । तुम आ जा रही हो। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा । तभी अचानक सेठ की घरवाली ने मुझे आवाज देते हुए कहा गब्बर मामा से जाकर यह कह दो के जल्दी से खाना खाने घर चले जाओ तुम्हें मामी ने बुलाया है । कुछ देर बाद सेठ खाना खाने चले जाते हैं । फिर मेरी मां उनसे पूछती है । तो उसे हंसी आ जाती है । और कहता है हां कल ₹1 मैंने उसे जूस पीने के लिए दिया था । तो मेरी मां को संतुष्टि मिलती है । तो सेठ की घरवाली कहती है कि बच्चों को पैसे मत दिया करो  पैसे देने से बच्चे बिगड़ जाते हैं। पैसे देना है इनको दिया करो । सेठ ने कह दिया ठीक है अब नहीं दूंगा । इस तरह से हमारी जिंदगी व्यतीत हो रही थी लेकिन यह बात हमारे पिताजी गुलाब को पता नहीं थी के उनके बेटा गब्बर दुकान पर काम कर रहा हैं । एक दिन मेरे पिताजी गुलाब बाजार में उस दुकान के सामने से निकले जहां में काम कर रहा था । उन्होंने उनसे पूछा यहां क्या कर रहा है । मैं उनसे बोला नहीं चुपचाप खड़ा रहा । तो उन्होंने फिर पूछा मेने कहा कुछ नहीं वैसे ही खड़ा हुआ हूं । मैं उनसे चिल्ला कर बोला । उन्होंने मुझसे कहा कमीन को बोलने का तमीज नहीं है । उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा और वहीं पास में एक दुकान पर जाकर अपना काम कराने के लिए बैठे थे । तभी हमारे दुकान वाले सेठ ने मेरे हाथ में 10 लीटर की कट्टी देते हुए कहा कि कंट्रोल से इसे  कैरोसिन से भरवा कर घर रख आओ । मैं कट्टी लेकर चला गया । कंट्रोल के सामने ही पापा बैठे थे । मैंने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया । मैं कंट्रोल से 10 लीटर की  केरोसिन की कैन को भरवाकर दोनों हाथों से लटकाए हुए धीरे धीरे भीड़ में से बाहर निकल रहा था । फिर मैं बाहर आ गया । और धीरे-धीरे उसको बाईपास वाली गली में से निकालते हुए उनके घर ले जाने लगा । पीछे से मेरे पिताजी मुझे देखते हुए मेरे पीछे आ रहे थे । मैं बड़ी मुश्किल से दोनों हाथों से पकड़कर रख रख कर उस कट्टी को घर तक ले जा रहा था । यह देख कर मेरे पापा गुलाब को बहुत दुख हुआ । वे पढ़े लिखे इंसान थे । उन्होंने इंग्लिश से डबल M.A. की थी । लेकिन उनकी नौकरी नहीं लग पाई थी । उस समय हमारी उम्र पढ़ने की थी पढ़ने लिखने की थी ।  हम शरीर से भारी काम कर रहे थे । तो उन्होंने उस कट्टी को ले जाते हुए मुझे देखा धीरे-धीरे करके मैं उस कट्टी को लेकर सुनार के घर पहुंच गया । फिर वह वहां से वापस आ गए । और अपना काम करवाने लगे । फिर थोड़ी देर बाद भी केले लेकर मेरे पास आए और मुझे दो केले दे दिए मैंने उन्हें खा लिया ।  लेकिन वे मुझे इस तरह मुझे काम करते हुए देखकर बहुत परेशान थे । लेकिन उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा था । वे चुपचाप वहां से चले गए । एक दिन रविवार था । उस दिन कंट्रोल की छुट्टी थी । उस दिन मैं दुकान पर काम कर रहा था । एक ग्राहक को कांच का एक गुलदस्ता दिखा रहा था । कि अचानक मेरे हाथ से वह गुलदस्ता गिर गया । और वह टूट गया । तभी सेठ ने कहा निकल जहां से बत्तमीज मुझे तेरी जरूरत नहीं है । मैं अपनी चप्पल पहकर वहां से घर के लिए आ गया । तभी विधानसभा के चुनाव थे । चुनाव की तारीख 7 दिन बाद थी । अगले दिन सुबह से ही बस बंद हो गई । में सुबह नहा धोकर तैयार होकर बस देखने लगा । लेकिन मुझे 2 घंटे तक बस नहीं मिली । उस दिन से 7 दिन तक में दुकान पर नहीं गया । चुनाव की वोटिंग होने के बाद अब सभी बस चालू हो गयी थी । तो फिर मेरी मां ने मुझसे दुकान पर जाने के लिए कहा । मैं 7 दिन से नहीं गया था । तो मैंने मम्मी से कहा कि तुम मेरे साथ चलो धम्मा मामा मुझसे डांट लगाएगा ।  कि इतने दिनों से कर्मों नहीं आया था । मां ने कहा दो-तीन दिन बाद मैं चलूंगी तुम मेरे साथ चलना । मैंने कह दिया ठीक है मैं तुम्हारे साथ ही चलूंगा । सुबह सुबह उठकर मैं बाहर जाकर खेल रहा था । बाहर ही मेरे पिताजी बैठे थे । उन्होंने देखा सुबह-सुबह सामने सड़क से बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल जा रहे हैं । मैं वहां पर खेल रहा था । तो उन्होंने मुझे कहा गब्बर बहुत दिन हो गए तू स्कूल नहीं गया चल तुझे स्कूल छोड़ कर आता हूं । में बिना कुछ बोले चुपचाप वहां से भीतर आ गया । कुछ देर बाद वो भी वहां से उठकर हमारे दरवाजे पर आकर बोले - गब्बर चल जल्दी फटकार स्कूल के लिए तैयार हो । मैं स्कूल नहीं जाना चाहता था ।  लेकिन मैंरे पिताजी गुलाब स्कूल जाने की जिद कर रहे थे । मैं चुपचाप अपनी मां के बगल से जाकर एक कोने में बैठ गया । थोड़ी देर तक इंतजार करने के बाद उन्होंने खुद अंदर आकर मेरा स्कूल का बैग को तलाशने लगे । कुछ देर के बाद उनको मेरा स्कूल बैग मिल गया । उन्होंने स्कूल बैग को खुद अपने हाथ में लेकर जोर से कहा चल स्कूल फटाफट  । लेकिन मैं नहीं बोला । फिर वे मैं व़ो स्वेम मम्मी के पास आ गए । और जबरदस्ती मेरा हाथ पकड़कर मुझे वहां से खींच कर उठा लिया । मैं जोर जोर से रोने लगा । और स्कूल नहीं जाने के लिए कहने लगा । मम्मी ने भी मना किया था । वह स्कूल नहीं जा रहा है उसे छोड़ दो । लेकिन पापा नहीं माने उन्होंने कहा तू शांत चुपचाप बैठी रह । तूने ही इन सभी को बिगाड़ा है । मैं आज इसे स्कूल ले जाकर रहूंगा । कैसे नहीं जाएगा स्कूल पढ़ने । उन्होंने मेरे स्कूल बस्ते को अपने कंधे में डाल लिया और एक हाथ से मुझे पकड़ा और दूसरे हाथ में डंडा लेकर मुझे पीटते हुए स्कूल ले जाने लगे । मैं बहुत ज्यादा रो रहा था । और कह रहा था कि मुझे कल से दुकान पर जाना है । में स्कूलू नहीं जाउंगा । मम्मी ने कहा उसको छोड़ दो । लेकिन पापा नहीं माने उन्होंने मुझ में डंडे देने शुरू कर दिए । डंडा से मारते हुए मुझे स्कूल तो ले गए । लेकिन स्कूल से वापस लौट कर घर आए तो देखकर दंग रह गए । बड़े भाई राजेश ने कहा कि पापा मम्मी कुएं में गिर पड़ी है । उसे जल्दी बाहर निकालो । पापा ने जैसे ही कुएं में देखा तो यह बात सच थी । उन्होंने जोर जोर से गांव के लोगों को मदद के लिए आवाज लगाई । आवाज लगाते ही बहुत से लोग इकट्ठे हो गए । और तुरंत ही कुछ लोग रस्सी के सहारे कुएं में घुस गए । किसी भी तरह उन्होंने मेरी मां को कुऐ से जिंदा बाहर निकाल लिया । बाहर निकालने के बाद पिताजी मुझ को लेने स्कूल में गए और मुझे स्कूल से वापस घर ले आए । लेकिन उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया । शाम को मम्मी को अच्छे से होश आ गया था । और वह हम सभी बच्चों से अच्छी तरह बातें कर रही थी । तभी पापा वहां पर आए । और मम्मी से बोले तुझे क्या चाहिए एक बार तो हमसे बोला होता हम नहीं लाते तो तू हमसे कहती । बिना बोले हमको क्या पता कि तुझे क्या चाहिए तू क्यों परेशान है । तो मम्मी ने चिल्लाते हुए कहा तुम्हें पता नहीं चार चार बच्चों का खर्चा कहां से चलाऊं ? इन्हें जहर देकर मार दूं ? या फिर खुद ज़हर खा लूं । तुम्हारे बच्चे तो यह है ही नहीं यह तो मेरे ही तो है ? मुझे ही तो इन्हें किसी तरह पालना है । पिताजी समझ गए कि बच्चों के खर्चे से परेशान है इसलिए इसने अपने बच्चों को बनिया की दुकान पर लगाया है । खर्चे से परेशान होकर ही इसने यह खतरनाक कदम उठाया है? तो उन्होंने कहा ठीक है मैं अभी बाजार से सारा सामान लेकर रख देता हूं । और किसी चीज की तुझे जरूरत पड़े तो मुझे बोल देना । मैं किसी भी तरह तुझे लाकर दूंगा । लेकिन बच्चों को बनिए की दुकान पर काम करने के लिए मत भेजना । जिसमें मेरी भी बेइज्जती होती है । दूसरे दिन पिताजी बाजार से सभी सामान लेकर आए और उन्होंने घर पर रख दिया । थोड़ी देर बाद उन्होंने सभी के लिए खाना बनाया । मां से पूछ कर सभी बच्चों ने खाना खा लिया लेकिन मम्मी ने नहीं खाया । दोपहर के समय मम्मी ने अपने लिए रोटी बनाई और सब्जी बनाकर खाना खा लिया था । शाम के समय पिताजी एक बड़ी सी लौकी लेकर सभी बच्चों के लिए सब्जी बनाने रसोई में आए । तो मां ने उनको देख लिया । गब्बर से कहा पापा से यह कह दो कि दोपहर के समय में आलू की सब्जी बना ली थी वह रखी है । तो पिताजी ने कहा मैं अपने और गुलजार के लिए बना लेता हूं । तो मम्मी ने कहा इसी में से गुलजार चाचा को दे देना । फिर वह उस लोकी को लेकर वापस गुलजार चाचा के कमरे में चले जाते हैं । और थोड़ी देर बाद स्टील की एक बड़ी सी थाली में गेहूं का आटा लेकर रोटी बनाने आते हैं । तो मम्मी ने कहा पापा से यह कह दो थोड़ी देर बाद में बनाकर तुम्हारे और गुलजार चाचा के लिए थाली लगाकर भेज दूंगी । तो पापा ने कहा कि अभी तेरी तबीयत ठीक नहीं है अगर तेरा मन है तो फिर किसी दिन बनाकर खिला देना । तो मम्मी ने कहा मैं ठीक हूं और थोड़ी देर बाद खाना बनाती हूं । अब तुम चले जाओ । पिताजी मन ही मन बहुत प्रसन्न हो जाते हैं । गुलजार चाचा के कमरे में वापिस चले जाते हैं । इस बात को वे गुलजार चाचा से कहते हैं । गुलजार चाचा बहुत खुश होते हैं ।आगे की कहानी अभी लिख रहा हूं जल्द ही प्रकाशित  हो जाएगी


कि थैला जैसा था वैसा ही रखा है । किसी ने भी थैले से हाथ नहीं लगाया था । गुलाब ने अपने पुत्रो को आवाज देकर कहा गब्बर, राजेस, राजीव लो केले खा लो सभी ने अपनी मां की तरफ देखा तो मां की आंखें गुस्से से लाल थी । किसी ने अपने पिता गुलाब से केले लेने की हिम्मत नहीं की थी । पूरे सामान और केलो को लेकर गुलाब गुलशन के यहां चला गया और और थैला रख दिया । और गुलजार चाचा को सारी बात बता दी । गुलजार ने कहा तू एक काम कर कल अपनी बहन गुलफाम कली के यहां जाकर पूछ कि अब मुझे क्या करना चाहिए । वह बहुत अच्छी है और अपना हमेशा भला चाहती है । गुलाब दूसरे ही दिन बहन गुलफाम कली के यहां जाता है । और उसे आपने परिवार का किस्सा सुनाता है । जिसे सुनकर लुटेरी गुलफाम कली मन ही मन बहुत खुश होती है । यह कहती है गुलाब भाईसाहब जितना हो सके उसे परेशान कर । बच्चों को परेशान कर । तभी उसके होस ठिकाने आऐंगे । गुलाब ने अपनी बहिन गुलफाम कली के कहे अनुसार वैसा ही किया । वह अपनी पत्नी से रोज-रोज झगड़ा करने लगा । झगड़े से तंग आकर रखी है । तो पिताजी ने कहा मैं अपने और गुलजार के लिए बना लेता हूं । तो मम्मी ने कहा इसी में से गुलजार चाचा को दे देना । फिर वह उस लोकी को लेकर वापस गुलजार चाचा के कमरे में चले जाते हैं । और थोड़ी देर बाद स्टील की एक बड़ी सी थाली में गेहूं का आटा लेकर रोटी बनाने आते हैं । तो मम्मी ने कहा पापा से यह कह दो थोड़ी देर बाद में बनाकर तुम्हारे और गुलजार चाचा के लिए थाली लगाकर भेज दूंगी । तो पापा ने कहा कि अभी तेरी तबीयत ठीक नहीं है अगर तेरा मन है तो फिर किसी दिन बनाकर खिला देना । तो मम्मी ने कहा मैं ठीक हूं और थोड़ी देर बाद खाना बनाती हूं । अब तुम चले जाओ । पिताजी मन ही मन बहुत प्रसन्न हो जाते हैं । गुलजार चाचा के कमरे में वापिस चले जाते हैं । इस बात को वे गुलजार चाचा से कहते हैं । गुलजार चाचा बहुत खुश होते हैं ।आगे की कहानी अभी लिख रहा हूं जल्द ही प्रकाशित  हो जाएगी


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suman sanger

हैलो में सुमन सेंगर भोपाल से हूं । इस वीडियो को पूरा चलाने का सॉफ्टवेयर कंपनी ₹50 का रिचार्ज दे रही है Click करें 👇👇👇👇👇👇👇 Check out 50 Rs Free: https://t.me/GyanAaeena